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मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

गर्भवती माता, धात्री माता तथा शिशु का प्रथम १००० दिवस में पोषण आहार

बच्चों के जीवन की नींव जो गर्भावस्था और प्रथम 2 वर्ष की उम्र अर्थात प्रथम 1000 दिन में पड़ती है.  इस समय गर्भवती स्त्री, धात्री माँ एवं शिशु के स्वास्थ्य का ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है. अगर माँ स्वस्थ्य रहेगी तो शिशु भी स्वस्थ्य रहेगा. इन १००० दिवस को भाग में विभक्त किया जाता है. यह हैं:


1. गर्भावस्था के 270 (दो सौ सत्तर दिन)

2.बच्चे के जन्म के दो साल अर्थात  730 दिन (सात सौ तीस दिन).

 

शिशु के समान्य विकास हेतु गर्भवती एवं धात्री माँ के लिये आवश्यक पोषक तत्व:


1.  लौह तत्व:

गर्भस्थ शिशु के शारीरिक अंगों के विकास तथा उसके शरीर के अंगों के सुचारु रूप से कार्य करने हेतु लौह तत्व आवश्यक होता है. गुड़, पालक जैसी हरी भाजियाँ, सोयाबीन और सोयाबीन से बना पनीर (टोफू), विभिन्न दालें, कुम्ड़ाह के बीज, किनोआ, अनार, अंजीर, खजूर, किशमिश  लोहे की कड़ाही में पकी सब्ज़ियों का सेवन करना आवश्यक होता है. लौह तत्व की आपूर्ति दैनिक आहार में इन चीज़ों को सम्मिलित कर और पूरक गोलियों (लौह तत्व की सप्लीमैंट गोलियाँ जो कि आँगनबाड़ी अथवा स्वास्थ्य केन्द्र से प्राप्त होती हैं) के सेवन से हो जाती है.


2.  विटामिन सी: 

शरीर द्वारा लौह तत्व के अवशोषण हेतु खट्टे फल जैसे नींबू, संतरा, मौसंबी, चकोतरा, करौन्दा, अमरूद, आँवले, अंगूर, कच्चा आम और टमाटर का सेवन अवश्य करें.  जब भी लौह तत्व युक्त भोजन  का सेवन कर रहे हों उस समय दूध, दूध के उत्पाद कैसे खीर, दही, पनीर, छाछ, चाय, कॉफी एवं सम्पूर्ण अनाज का सेवन नहीं करें क्योंकि यह शरीर में लौह तत्व के अवशोषण को घटा देते हैं.  

          

3. फोलिक अम्ल:

फोलिक अम्ल पालक, प्याज़ के पत्ते जैसी हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, मटर, चना, राजमा, पत्ता गोभी (ब्रसल), ब्रॉकली (हरी गोभी), आदि हैं.  दैनिक आहार से प्राप्त होने वाले फोलिक अम्ल के अतिरिक्त, गर्भवती माँ को  प्रति दिन इसकी पूरक गोली (सप्लीमैंट) के रूप में ऊपर से  करना चाहिये जिससे शिशु के भीतरी शारीरिक अंगों का विकास पूरी तरह से हो पाये.


4. आयोडीन युक्त भोजन:

गर्भस्थ शिशु तथा धात्री एवं गर्भवती माँ के थाईरॉईड हॉर्मोन के निर्माण के लिये आयोडीन आवश्यक पौष्टिक तत्व है. थाईरॉईड हॉर्मोन के कारण  शिशु तथा माँ का तंत्रिका तंत्र का विकास एवं मनोवैज्ञानिक विकास अच्छा रहता है. आयोडीन युक्त नमक, आयोडीन मिश्रित ब्रैड, दूध एवं दुग्ध उत्पाद, अंडे एवं माँसाहार इत्यादि आयोडीन के अच्छे आहारीय स्त्रोत है.

 

माँ द्वारा संतुलित आहार का सेवन:

संतुलित आहार के लिये उचित मात्रा में अनाज से निर्मित उत्पाद, दाल, दूध और दूध से निर्मित दुग्ध उत्पाद, अंडे और माँसाहार, फल एवं सब्ज़ी और कम मात्रा में घी, तेल और मीठे का सेवन प्रति दिन आहार में करना चाहिये. थाली में भोजन रंगबिरंगा होना चाहिये. जितने अधिक प्राकृतिक रंग के भोज्य पदार्थ/व्यंजन सम्मिलित करेंगे आहार  उतना ही अधिक पौष्टिक होगा. ध्यान रखें कि अधिकाधिक भोज्य पदार्थ स्थानीय तौर हमारे गाँव/कस्बे पर उत्पादित किये गये हों और मौसमी हों. ऐसा भोजन हमारे शरीर के लिये पाचक होता है. ताज़ी सब्ज़ियों और फल की आपूर्ति हेतु घर पर ही रंगबिरंगी गृह वाटिका ज़रूर लगायें.

 

शिशु का आहार:

1. जन्म के उपरांत शिशु का आहार: 

प्रसव के पश्चात् 6 माह तक शिशु को केवल स्तनपान कराना चाहिये.

2.सातवें (7 वें) माह से की अवधि में: 

दो से तीन (2 – 3) छोटे चम्मच नरम दाल दलिया अथवा दाल चावल अथवा दाल - रोटी मसलकर अर्ध ठोस (चम्मच से गिराने पर सरकेबहे नही)खूब मसले साग एवं फलप्रतिदिन दो बार तथा दें। स्तनपान जारी रखें। नियमित स्तनपान भी जारी रखें.

3.आठवें से नौवें (8-9 वें) माह से की अवधि में:

नरम दाल दलिया अथवा दाल - चावल अथवा दाल - रोटीकी धीरे - धीरे मात्रा बढ़ायें.  नियमित स्तनपान भी करायें. लगभग 2-3 बार आधी कटोरी भोजन दें. टुकडों में नरम फल भी अवश्य दें. यदि मांसमछली एवं अण्डा खाते हैं तो उसे भी शामिल करें.  

4.नौवें से ग्यारवें (9-11 वें) माह की अवधि  में:

नरम दाल - दलियादाल - चावलदाल - रोटीप्रतिदिन धीरे - धीरे मात्रा बढ़ाते हुए दें.  अच्छी तरह कटे हुए फल एवं बिना मसला आहार हुआ दिन में तीन बार दें . नियमित स्तनपान जारी रखें. एक बार में 250 मिली का कप/कटोरी भरकर आहार बच्चे को खिलायें.

5.बारवें माह से दो वर्ष (12 माह - 2 वर्ष) की अवधि में:  

घर पर पका पूरा खानाधुले एवं कटे फल, 3 भोजन तथा 2 नाश्ते के रूप में देंएक बार में 250 मिलीका कप भरकर आहार बच्चा प्रत्येक भोजन में ग्रहण करें. स्तनपान के बीच में आहार देना चाहिएनियमित स्तनपान जारी रखें.

 

गर्भावस्था के दौरान लिये जाने वाले महत्वपूर्ण कार्य:

1. गर्भावस्था की पहचान होने पर अतिशीघ्र निकटम स्वास्थ्य केन्द्र पर जाकर पंजीकरण करना नियमित जाँच कराना.

2.पौष्टिक व संतुलित आहार का सेवन करना.

3. स्तनपान के सम्बन्ध में उचित जानकारी प्राप्त करना.

4.चिकित्सक द्वारा दिए गये परामर्शों का पालन करना.

 

सुनिश्चित करना:

1.जन्म के एक घंटे के भीतर बच्चे को स्तनपान कराना.

2.बच्चे को कोलस्ट्रम (प्रारम्भिक पीला दूध) बच्चे को पिलाना.

3. छह माह तक शिशु को केवल स्तनपान कराना.

4. छह माह तक के बाद ऊपरी आहार की शुरुआत करना

5.शिशु एवं बच्चे को नियमित स्वास्थ्य जाँच कराना.

6.शिशु एवं बच्चे का नियमित व समय से टीकाकरण कराना.

डिस्क्लेमर:

यह लेख सिर्फ जानकारी के लिये है, कृपया किसी भी प्रकार के आहारीय परिवर्तन के पूर्व चिकित्सक अथवा न्यूट्रीशनिस्ट से राय अवश्य ले लें।

आग्रह:

कृपया लेख सम्बन्धी अपने बहुमूल्य विचार नीचे दिये गये कमेंट बॉक्स में अंकित करने की कृपा करें


सादर

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बुधवार, 21 अगस्त 2024

सिकिल सैल ऐनिमीया (अर्धचंद्राकार कोशिका रक्ताल्पता ) की पहचान और प्रबंधन

माता पिता से प्राप्त अनुवांशिक आर.बी.सी (लाल रक्त कोशिका) विकार के कारण शिशुओंबच्चों और वयस्कों में सिकिल सैल ऐनिमीया (अर्धचंद्राकार कोशिका रक्ताल्पता) की समस्या हो जाती है. इस समस्या से ग्रसित व्यक्ति के रक्त में विद्यमान लाल रक्त कोशिका (आर.बी.सी.)जिसका आकार गोल अंडाकर होता हैपरिवर्तित हो कर अर्धचंद्राकार हो जाता है. स्वस्थ्य एवं सामन्य लाल रक्त कोशिका की तुलना मेंअस्वस्थ्य लाल रक्त कोशिका चिपचिपी होती हैं.  स्वस्थ लाल रक्त कोशिका (आर.बी.सी.)रक्त के साथ शरीर की रक्त वाहिका में प्रवाहित (बहना) होती हैं जिससे शरीर के विभिन्न अंगों में ऑक्सीजन पहुँचती है. किन्तु अर्धचंद्राकार लाल रक्त कोशिकारक्त वाहिका में प्रवाहित (बहना) नहीं हो पाती हैं अत: अंगो तक ऑक्सीजन पहुँचाने का कार्य नहीं कर पाती हैं. आमतौर पर स्वस्थ्य एवं सामान्य लाल रक्त कोशिका का जीवन १२० दिन का होत है किंतु असामान्य लाल रक्त कोशिका का जीव १० से २० दिनों का ही रहता है जिस वजह से शरीर में रक्तताल्पता (रक्त की कमी) होने लगती है.   


सिकिल सैल ऐनिमीया (अर्धचंद्राकार कोशिका रक्ताल्पता के लक्षण : 

भ्रूण में उपस्थित हीमोग्लोबिन (लाल रक्त कोशिका में पाया जाने वाला प्रोटीन अणु) के शिशु के शरीर पर प्रभाव के कारण शिशु के जन्म से कुछ दिनों तक इस समस्या के लक्षण दिखाई नहीं देते किंतु कुछ समय के उपरांतजैसे ही शिशु के शरीर में भ्रूण में उपस्थित हीमोग्लोबिन का स्थान असमान्य हीमोग्लोबिन ले लेता हैवैसे ही सिकिल सैल ऐनिमीया के लक्षण शिशु में दिखाई देने लगते हैं.  यह लक्षण इस प्रकार हैं:

१.      शिशु का कमज़ोर होना अपेक्षित शारीरिक विकास का नहीं हो पाना.

२.      रक्ताल्पता होनाथकावट महसूस करना. लाल रक्त कोशिका का टूटना. 

३.      हाथ पैर में दर्द होनासूजन आना तथा छाती में दर्द महसूस करना.

४.      आँखों से साफ नहीं दिखना.

५.      मूत्र की सघनता में कमी होना. शरीर में पानी की कमी होना.

६.      शरीर में बिल्युरुबिन नामक तत्व का बढ़ना जिसके कारण शरीर में पीलापन आना साथ ही संक्रमण होना.

७.      प्लीहा का सामन्य रूप से कार्य नहीं कर पाना.ना. अन्य आंतरिक अंगों का सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाना.


सिकिल सैल ऐनिमिया से बचाव :

रक्ताल्पता से ग्रसित शिशुबालकबालिकायवकयुवतीगर्भवती अथवा धात्री महिला अथवा पुरुष के उपचार के बाद भी यदि स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार देखने को नहीं मिले और रक्त चढ़ाने की आवश्यक्ता लगे तो यह समझा जा सकता है कि संभावना है कि ऐसा व्यक्तिसिकिल सैल रक्तालपता से ग्रसित है.  ऐसे व्यकि की जाँच विकास खंड स्तर पर स्वास्थ्य विभाग मे अस्पताल में करवाई जा सकती है.  

सिकिल सैल रक्ताल्पता से ग्रसित युवक को सिकिल सैल से ग्रसित युवती से विवाह नहीं करना चाहिये अन्यथा संतान भी सिकिल सैल रक्ताल्पता से ग्रसित होगी. 

  

डॉक्टर से इस समय सम्पर्क करें :  

अगर शिशु को तेज़ बुखारचिड़चिड़ापनशरीर की त्वचा में पीलापनतेज साँसेंपेट बाहर की ओर निकलनाहाथ और पैरों में सूजनकमज़ोरीबेसुध होनेआंखों में दिक्‍कत होना और दौरे पड़ने की स्थिति में शिशु को तुरंत डॉक्‍टर को दिखायें.


सिकिल सैल रक्ताल्पता में ध्यान देने वाली बातें :     

1.   ठंड से बचें. सिकिल सैल रक्ताल्पता से ग्रसित शिशुबच्चे अथवा व्यक्ति को ठंड से बचायें. ठंडे मौसम में गर्म कपड़े धारण करवायें ठंडे पानी से स्नान नहीं करायें तथा ठंडे तापमान का तथा ठंडी तासीर के खान- पान का सेवन नहीं करने दें.  इस व्यक्ति को सर्दीखाँसी और ज़ुखाम से बचायें. तापमान के कम हो जाने से रक्त वाहिका संकुचित हो जाती हैं जिससे सिकिल सैल रक्ताल्पता की समस्या बढ़ सकती है. बहुत अधिक तापमान से भी बचें.  

2.   प्रभावित व्यक्ति को बहुत अधिक मेहनत अथवा कसरत नहीं करनी चाहिये जिससे शरीर में ऑक्सीजन की आवश्यक्ता बढ़ जाये अन्यथा प्रभावित व्यक्ति को श्वाँस लेने में कठिनाई हो सकती है. थोड़ी शारीरिक गतिविधि वह कर सकता है जिसमें उसकी साँस नहीं फूले.

3.   समुद्र तल से अधिक ऊँचाई पर नहीं जायें जहाँ ऑक्सीजन की कमी होती है अत: श्वाँस फूल सकती है.

4.   पौष्टिक भोजन का सेवन करेंनियमित रूप से पानी पियें. पूरक फोलिक अम्ल की गोली५ मिलीग्राम प्रति दिन १० माह तकज़िंक की १० मिलीग्राम की गोली प्रति दिन(१ से २महिने) वयस्कता तक सेवन करें. 

5.   ऐसे आहार का सेवन नहीं करें  जिससे शरीर में अम्लता बढ़े जैसे चायकॉफीनशीली वस्तुयें जैसे सिगरैटबीड़ीतम्बाकूभाँगधतूरा तथा मदिरा .

6.   भोजन में सोडे का उपयोग नहीं करें साथ ही सोडायुक्त पेय पदार्थ का सेवन भी नहीं करें जिससे विटामिन-बी का शरीर में अवशोषण बाधित होगा.

7.   रात के समय चावलदहीखट्टी खाद्य सामग्री एवं फलों का सेवन नहीं करें.


आहार संबंधी सावधानियाँ :

1.   सिकिल सैल ऐनीमिया से प्रभावित व्यक्ति के लिये  प्रोटीनऊर्जाकैल्शियमविटामिन-डीविटामिन-बी कॉम्प्लैक्सविटामिन-सीज़िंक (जस्ता) और कॉपर (ताँबा) महत्वपूर्ण पोषक तत्व हैं जिन्हें आहार अथवा पूर्क पोषक तत्व गोलियों (स्प्लीमैंट) द्वारा ग्रहण करना चाहिये..

2.   प्रतिदिनउचित समय पर सम्पूर्ण तथा ताज़े आहार का सेवन करें. भोजन में मौसमी एवं स्थानीय खाद्य सामग्री जैसे  सम्पूर्ण अनाज (मैदा तथा मैदे से बनी खाद्य सामग्री का सेवन नहीं करें. )दालमेवेतिलहन / तिलरंगबिरंगी सब्ज़ियाँ और फलगुड़दूध (हल्दी के साथ) तथा दुग्ध पदार्थ का सेवन करें. खाने में मेथी दाना और मुनगा भी शामिल कर सकते हैं जो कि कैल्शियम के अच्छे स्त्रोत हैं.

3.   थाली में अधिक से अधिक रंग के व्यंजनों को शामिल करें. घर पर पोषण गृह वाटिका लगायें जिसमें स्थानीय एवं मौसमीरंगबिरंगी सब्ज़ी और फलदार वृक्ष लगायें और मौसमी और ताज़े फल सब्ज़ी घर पर ही पायें.    

4.   ठंड के दिनों मेंस्नान करने के पूर्व शरीर में तेल की मालिश कर के धूप तापें जिससे शरीर में विटामिन डी का निर्माण  होगा. विटामिन डी की उपस्थिति में शरीर कैल्शियम को भली-भाँति अवशोषित कर सकेगा. आवश्यक्ता पड़ने पर दर्द निवारक दवाईयों का भी उपयोग कर सक्ते हैं किंतु यह सभी उपचार अच्छे चिकित्सक के देखरेख में ही करें.

5.   ग्रसित व्यकि तथा इस व्यक्ति की देखरेख कर रहे व्यक्ति को सिकिल सैल तथा इसके प्रबंधन विषय के बारे में शिक्षितजागरुक तथा प्रशिक्षित होना ज़रूरी है.

6.   सिकिल सैल रक्ताल्प्ता ग्रसित व्यक्ति को प्रसन्न्चित्त रहना चाहिये.

7.   सिकिल सैल रक्ताल्प्ता से ग्रसिक व्यक्ति को तनाव से दूर रहना चाहिये.     


आग्रह ; 

कृपया अपने विचार और सुझाव नीचे दिये गये कमैन्ट बॉक्स में अवश्य अंकित कर प्रोत्साहितव 

करें 

सादर 


कृपया ध्यान दें :

उपरोक्त लेख केवल सूचनार्थ है, आवश्यकता पड़ने पर कृपया चिकित्सक से संपर्क करें.

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शनिवार, 6 जुलाई 2024

दाल के सेवन की पारंपरिक विधि एवं कारण

🌻🌼☘️🌻🌼🍀
आदरणीय सुधिजन
*प्रियतम अवतार मेहेरबाबा जय जिनेन्द्र सदा*
🙏🏻🌈🌈😇😇🙏🏻

लंबे समय में, पीढ़ी दर पीढ़ी अनुभव साझा होते-होते आहार सम्बन्धी परम्परायें विकसित होती हैं जो समय की कसौटी पर कसी हुई होती हैं इसलिए भरोसेमंद  होती हैं।  

दाल, आहार का एक महत्वपूर्ण अवयव है जो कि अन्य पौष्टिक तत्वों के अतिरिक्त प्रोटीन का उत्तम और प्रमुख स्त्रोत है जो शरीर के निर्माण और विकास में सहयोग प्रदान करता है। यह शरीर में होने वाली टूट-फूट को ठीक करता है और शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है।

समय के साथ, आहार में दाल के सेवन की पारंपरिक पद्धति का भी विकास हुआ है। किन्तु क्या इन परम्पराओं का कोई वैज्ञानिक आधार भी है ? प्रस्तुत लेख इसी विषय को प्रस्तुत करने का विनम्र प्रयास है।

पारंपरिक रूप से ग्रामीण तथा कुछ हद तक शहरी भारत के लोग दाल बनाने के दौरान निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन करते हैं : 

 1. दाल को सेंकना / भूनना फिर सिंकी / भुनी हुई दाल को पका कर कर सेवन करना।
 2. दाल को उबालते समय ऊपर आने वाले झाग / फेन को हटा देना।
 3. दिन में एक बार ही, दोपहर में दाल खाना।

*इन प्रक्रियाओं के वैज्ञानिक कारण:* 
 1. मनुष्य के पाचन तंत्र में ट्रिप्सिन नामक जैव उत्प्रेरक (एंज़ाईम, Enzyme) आहार के पाचन में सहायता करता है किन्तु दाल में ट्रिप्सिन अवरोधी कारक (ट्रिप्सिन इन्हिबिटर, Trypsin Inhibitor) विद्यमान होता है जो कि पाचन में सहायक ट्रिप्सिन जैव उत्प्रेरक को कार्य करने से रोकता है जिसका तात्पर्य है कि ट्रिप्सिन अवरोधी कारक के कारण दाल को पचाना कठिन होता है।
जब दाल सेंकी / भूनी जाती है (तापमान लगभग 80 डिग्री सेल्सियस पर), तब ट्रिप्सिन अवरोधी कारक निष्क्रिय हो जाता है, जिस वजह से दाल सुपाच्य हो जाती है।

 2. दाल उबालने के समय ऊपर आने वाले झाग / फेन में सैपोनिन (साबुन जैसा चिकना तथा लसलसा पदार्थ) होता है, जिसके साथ रैफिनोज़ शर्करा (शक्कर, Sugar) भी उपस्थित होती है जिसका पूरा पाचन आँतों में नहीं जो पाता है जिस कारण आँतों में उपस्थित जीवाणु (बैक्टीरिया, Bacteria) शर्करा का किण्वन (फर्मेंटेशन, Fermentation) करते हैं जिसके फलस्वरूप पेट में गैस (आयुर्वेद के अनुसार वात अथवा वायु) बनती है और पेट फूलता है। यदि दाल को उबालते समय झाग / फेन को हटा दिया जाये तो साथ में रैफिनोज़ शर्करा भी हट जायेगी जिससे पेट में गैस बनने की और पेट फूलने की समस्या नहीं होगी। सैपोनिन के हटने के कारण दाल लसलसी नहीं बल्कि खिली-खिली बनती है तथा दाल के टुकड़ों की सतह की बनावट और भीतर की संरचना (परिवर्तित) हो जाती है। साथ ही साथ दाल में, नमक और मसालों का अवशोषण अच्छे प्रकार से हो पाता है, जिससे दाल स्वादिष्ट बनती है।

 3. पाचन तंत्र में ताँबा (कॉपर Copper) नामक रासायनिक तत्व उपस्थित होता है जो कि आहार के पाचन में सहायक होता है, किन्तु इस तत्व को सक्रिय करने वाला जैव उत्प्रेरक, स्वयं दिन में ही सक्रिय होता हैं सूर्य ढलने के बाद नहीं। अतः ताँबे का उपयोग पाचन तन्त्र दिन में ही कर पाता है रात में नहीं जिसके फलस्वरूप दिन में आहार का पाचन सुचारू रूप से हो पाता है किंतु रात में नहीं। दालें, प्रोटीन का उत्तम स्त्रोत होने के कारण दुष्पाच्य होती हैं।  अन्य पोषक तत्वों की तुलना में प्रोटीन का पाचन में सबसे कठिन होता है। रात में जब आहार का पाचन कम होता है ऐसे समय प्रोटीन का पाचन और भी अधिक दुष्कर हो जाता है। इसलिये रात को दाल का सेवन नहीं किया जाता है।

ताँबा रात में कम सक्रिय होता है यह प्रमाण इस बात से मिलता है कि रात में ताँबे पर निर्भर, मनुष्य के शरीर में उपस्थित, सुपर ऑक्साईड डाय म्युटेज़ (एस.ओ.डी., SOD) जैव उत्प्रेरक भी रात को कम सक्रिय हो जाता है इसी तरह शरीर में उपस्थित हॉर्मोन कॉर्टिसॉल और इन्स्युलिन भी दिन की तुलना में रात को कम सक्रिय हो जाते हैं जो कि शरीर में ताँबे के उपापचय, अवशोषण और शरीर के विभिन्न हिस्सों के वितरण हेतु आवश्यक हैं, अतः रात को ताँबे की शरीर में, सक्रियता भी धीमी पड़ जाती है।

आयुर्वेद के अनुसार सूर्य ढलने के बाद जठराग्नि जो कि आहार के पाचन के लिये आवश्यक है, वह भी मन्द पड़ जाती है। इस कारण रात को आहार का पाचन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है।

*इसका अर्थ :*
दाल को भून / सेंकने के बाद पका कर सेवन करना, दाल को उबालते समय ऊपर आने वाले झाग / झाग को हटा देना और दिन में ही दाल खाने की पारंपरिक पद्धति, विज्ञान भी स्वीकारता है।

*कृपया ध्यान दें:* 
आधुनिक पोषण विज्ञान के अनुसार एक वयस्क व्यक्ति (महिला अथवा पुरुष) को प्रति किलोग्राम शारीरिक वजन पर 0.8 ग्राम से 1 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता प्रति दिन होती है, वहीं बढ़ते बच्चों को लगभग 2 ग्राम प्रोटीन प्रति किलोग्राम शारीरिक वजन, प्रतिदिन की आवश्यकता होती है।

*संदर्भ :*  
1.आई.सी.एम.आर. गाईडलाईन्स 2024।
 2. न्युट्रिटिव वैल्यू ऑफ इंडियन फूड्स, आई.सी.एम.आर. एवं एन.आई.एन.
 3. फूड एंड न्यूट्रिशन, स्वामीनाथन।

*आग्रह:*
कृपया लेख के बारे में अपने विचार और सुझाव नीचे दिये गये कमेंट बॉक्स में अंकित कर प्रोत्साहित करें।

*सादर*
*मेहेर न्यूट्रिशन*
न्यूट्रिशन की जानकारी के लिये 
WA: 83193 93727
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मंगलवार, 8 अगस्त 2023

दो से छ वर्ष के बच्चों (प्री-स्कूल बच्चे) का पोषण तथा आहार

समूची बाल्यावस्था अर्थात् प्रथम 1000 दिन, माँ तथा बच्चे के लिये तथा दो से छह वर्ष के बच्चों  (प्रीस्कूल बच्चे) की उम्र, शरीर के विकास की तथा समझ के विकास की उम्र है अत: यह आवश्यक है कि बच्चों को संतुलित तथा  पोषक आहार मिले.  

पोषक आहार का निर्णय अधिकतर मातायें करती हैं. यदि माताओं को पोषण आहार के विज्ञान की छोटी-छोटी किंतु महत्वपूर्ण बातों का ज्ञान हो तो वे अपने बच्चों के आहार के बारे में सही निर्णय ले पायेंगी. इसी विषय पर आपके लिये यह लेख प्रस्तुत है.

अधिक जानकारी हेतु आप लेखक द्वय [(डॉ. किंजल्क सी.सिंह (वैज्ञानिक- कृषि विस्तार) तथा डॉ. चन्द्रजीत सिंह (वैज्ञानिक-खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)]  से मोबाईल नम्बर 9893064376 पर बात कर सकते हैं.

लेख पढ़ने हेतु कृपया इस लिंक पर क्लिक करें

 

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