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बुधवार, 21 अगस्त 2024

वर्षा ऋतु के लिये आहार-विहार

अलग-अलग छह ऋतुयें तथा बारह हिंदी मास के अनुसार प्रकृति में त्रिदोष (वात, पित्त तथा कफ) का प्रभाव अलग अलग होता है जिसका प्रभाव मनुष्य के शरीर पर भी पड़ता है । आहारीय सामग्री, किसी दोष विशेष में वृद्धि करने, कम करने अथवा सम रखने में सक्षम होती हैं । अतः आहारीय सामग्री का चुनाव, प्रकृति का मनुष्य के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को संतुलित करने के दृष्टिगत्‌ करना चाहिये ।   भारत में इस विषय पर वर्षों अनुसंधान किया गया है जिसे आयुर्वेदिक ग्रंथों में संकलित किया गया है । आहार एवं स्वास्थ्य विषय पर बुज़ुर्गों के अनुभवजन्य ज्ञान को लोकोक्तियों के रूप में भी संकलित किया गया है । इस ज्ञान का लाभ मनुष्य द्वारा स्वस्थ रहने के लिये किया जा सकता है । 

वर्तमान में वर्षा ऋतु चल रही है । आयुर्वेद के अनुसार इस ऋतु में प्रकृति में वात दोष प्रकुपित होता है तथा पित्त दोष संचित होता है । 


शरीर में वात के प्रभाव की पहचान :

1.यदि किसी व्यक्ति की अवस्था 50 वर्ष से अधिक है तो उस व्यक्ति का वात से प्रभावित होने की संभावना अधिक है ।

2. यदि जोड़ों, कमर में और हड्डियों में दर्द महसूस करते हैं तो सम्भावना है कि ऐसा मनुष्य वात से प्रभावित हो ।

3. यदि पेट में गैस बन रही हो अथवा डकार आ रही हो तो सम्भावना है कि शरीर में वात का प्रभाव हो ।

4.बालों में और त्वचा में रूखापन, गैस बनना।

6. पाचन कमज़ोर होना। 

7. रक्तचाप, ध्यान केंद्रित न हो पाना अथवा मन भटकना।


वर्षा ऋतु में वात को संतुलित करने के उपाय (आयुर्वेदिक अनुशंसायें) :

वर्षा ऋतु में वात दोष को संतुलित करने के लिये मीठे, खट्टे तथा नमकीन रस (स्वाद) वाली खाद्य सामग्री का सेवन करने की अनुशंसा है तथा तीखे (मिर्च, अदरक, अधिक मसालेदार आहार इत्यादि), कसैले (आँवला, कच्चा अमरूद, पालक, मसूर आदि) तथा कड़वे (करेला और नीम आदि) रस (स्वाद) की खाद्य सामग्री के सेवन  नहीं करने की अनुशंसा है ।  


वर्षा ऋतु हेतु परंपरागत तथा अनुभजन्य अनुशंसायें :

भारत में, पीढ़ी दर पीढ़ी, अनुभवजय ज्ञान हस्तांतरित किये जाने की पुरानी परंपरा है। आहार सम्बंधी ज्ञान भी इसी प्रकार हस्तांतरित हुआ। भाद्रपद माह के लिये परंपरागत रूप से प्रचलित अनुभजन्य ज्ञान इस प्रकार हैं :

1. श्रावण (सावन) माह हेतु परम्परागत एवं अनुभवजन्य अनुशंसायें:

१.  इस माह में हरड़ का सेवन अनुशंसित है जिससे पाचन दुरुस्त रहता है ।

२. इस माह में साग और नींबू  के सेवन की मनाही है।


2. भाद्रपद माह हेतु परंपरागत तथा अनुभजन्य अनुशंसायें :

१.इस माह में तिक्त रस का आहार जैसे मिर्च तथा मिर्च के उत्पाद का सेवन करना है ।

२.दही तथा  दही से निर्मित होने वाले आहार के सेवन की मनाही है।

इस विषय पर और अधिक जानकारी के लिए नीचे दी गई लिंक को कृपया क्लिक करें:

लिंक


वर्षा ऋतु में जठराग्नि की स्थिति और आहार :

वर्षा ऋतु में जठराग्नि मंद होती है अतः गरिष्ठ भोजन, रसोई के बाहर का भोजन, बासी अथवा लम्बे समय से रखा हुआ भोजन, ठंडा अथवा फ्रिज में रखा  भोजन, खमीर युक्त भोजन एवं मशरूम, का सेवन नहीं करें ।


आधुनिक पोषणाहार एवं वात नियंत्रण के उपाय:

चूँकि वर्षाकाल में आसमान में बादल होते हैं अतः सीधी धूप मनुष्य शरीर में कम पड़ती है। इस कारण से शरीर में विटामिन-डी का निर्माण कम होता है जिसके फलस्वरूप शरीर के द्वारा कैल्शियम का अवशोषण कम हो पाता है।
ऐसी स्थिति में कुछ लोगों का मन भी उदास हो जाता है क्योंकि बदली वाले मौसम में शरीर में होने वाली विटामिन-डी की कमी के कारण सैरोटोनिन के निर्माण में कमी आ जाती है।

पाचन हेतु सूक्ष्मजीवों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इन्हें सक्रिय अवस्था में रखने में विटामिन-बी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

शरीर में वात के नियंत्रण के लिये विटामिन-डी, कैल्शियम तथा विटामिन-बी युक्त आहार अथवा पूरक गोलियों (सप्लीमेंट) का सेवन लाभदायक होता है।


वर्षा ऋतु और अनाज :

वात की प्रकृति रूखी होती है, अतः रूखी आहारीय सामग्री जैसे लघु धान्य एवं मोटा अनाज, (मक्का, बाजरा, ज्वार, कोदो और कुटकी आदि) का सेवन नहीं करें । वर्षा ऋतु में नये चावल का सेवन भी नहीं करना चाहिये । 


वर्षा ऋतु और दालें :

चूँकि वर्षा ऋतु में वात को बढ़ाने वाली अथ गरिष्ठ अथवा भारी दालें जैसे मसूर, उड़द, राजमा, मटर, तिवड़ा, सोयाबीन, चना और छोला आदि, का सेवन नहीं करें ।  मुँहफली का सेवन भी अधिक मात्रा में नहीं करें ।


वर्षा ऋतु और सब्ज़ियाँ :

चूँकि हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ (साग आदि) पाचन में गरिष्ठ जोती हैं अतः वर्षा ऋतु में इनके सेवन से बचें । गोभियाँ (पत्ता गोभी, फूल गोभी आदि ), बैंगन और मूली भी वात कारक हैं अतः इस मौसम में इनके सेवन से भी बचें ।


वर्षा ऋतु एवं जल :

वर्षा ऋतु में जल के दूषित होने की सम्भावना अधिक होती है । अतः  कच्चे पानी का सेवन नहीं करना उचित है अन्यथा पेट सम्बंधी समस्या, हैजा और कॉलरा जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है।


वर्षा ऋतु में बरती जाने वाली सावधानियाँ :

1.     सुपाच्य, हल्के, घर की रसोई में बने भोजन का ही सेवन करें 

2.    सुबह का भोजन प्रातः 10.00 से 2.00 के मध्य करें। रात को भोजन सूर्यास्त से पहले करें । 

3 .   ताज़ा और गर्म तापमान का आहार का सेवन करें । 

4.  मीठा, खट्टा और नमकीन स्वाद का भोजन, विशेषकर खट्टा और नमकीन आहार का सेवन करें।

 5. गर्म पानी एवं अन्य पेय पदार्थ का सेवन करें। 

 6. आधा पेट खाना खायें, चौथाई पेट पेय पदार्थ था जल के लिये तथा बाकी चौथाई पेट वायु संचरण के लिये खाली रखें।

7. यदि लघु धान्य और मोटे अनाज का सेवन करें तो गाय के दूध से बना घी लगा कर करें । ऐसा करने से लघु धान्य एवं मोटे अनाज में स्निग्धता बढ़ेगी, जिससे वात के  प्रभाव में वृद्धि नहीं होगी साथ ही पित्त भी संतुलित रहेगा ।

8. गेहूँ चूँकि स्निग्ध होता है इसलिये इस माह में गेहूँ का सेवन किया जा सकता है ।

9.   इस माह में चावल कम से कम एक वर्ष पुराना ही खायें । चावल यदि नया खायें तो पहले भून लें, फिर  खुले बर्तन में पकायें फिर सेवन करें । चावल  का सेवन दिन में ही करें । 

10. दालों में मूँग दाल (बिना छिल्के की दाल अथवा छिल्के सहित दाल) अथवा अरहर की पतली दाल का गाय के दूध से बने घी से छौंका (बघार कर) लगा कर सेवन करें । 

11.. गाय के दूध से बने घी से छौंका लगा कर, मूँग की दाल और पुराने अथवा भुने चावल से बनी खिचड़ी का भी सेवन कर सकते हैं ।

12. स्वच्छ जल को स्वच्छ पात्र में तब तक उबालें ज एमएमब तक जल की मात्रा आधी हो जाये फिर ठंडा कर उपयोग में लें । जल को उबालते समय, जल में आधा चम्मच ज़ीरा अथवा अजवाईन  अथवा दो से तीन लौंग प्रति गंज पानी में डालें और औषधीय गुणों से भरपूर जल तैयार करें और सेवन  करें जो कि पाचन को ठीक करने के लिये तथा वात को नियंत्रित करने के लिये लाभकारी होता है । 

13.  खाना और पानी को ढक कर सुरक्षित स्थान पर रखें ।

14. यदि वर्षा ऋतु में साग का सेवन करना है तो, पहले साग को उबालें फिर हाथ के बीच दबा कर रस निकाल कर अलग कर दें । अब साग को गाय के दूध से बने घी में भून कर सब्ज़ी बना कर सेवन कर सकते हैं ।

15. गर्म अथवा गुनगुने पानी से स्नान करें।

16.स्नान करने के पूर्व अभ्यंग अर्थात शरीर में मालिश करें। मालिश करने के लिये तिल के तेल का उपयोग करें।

 17. अभ्यंग के उपरांत बेसन, हल्दी और देसी गाय के दूध से बने उबटन से शरीर के तेल को हटायें फिर गर्म /गुनगुने पानी से स्नान करें।

 18 .प्रातःकाल खाली पेट पवन मुक्तासन करें।

 19 सायंकाल अथवा रात्रि भोजन के बाद शतपदी करें अर्थात 100 कदम धीरे-धीरे टहलें।

20. सायंकाल अथवा रात्रि भोजन के बाद  वज्रासन करें।

21. सोते समय सबसे पहले वामकुक्षी आसन करें (कुछ देर बायें करवट ले कर लेटें)।


वात को नियंत्रित करने के लिये इस प्रकार का आहार नहीं लें:
1.ठंडा, रूखा, दुष्पाच्य आहार।
2.रखा हुआ, बासी, पुराना और ठंडा आहार का।
3. कड़वे, तीखे और कसैले स्वाद का आहार।
4. कच्चे आहार और पत्तेदार आहार।
4.सामान्य अथवा ठंडा पानी एवं अन्य पेय पदार्थ।
5.भोजन आवश्यकता से अधिक नहीं करें।


वर्षा ऋतु में विहार :

1. भोजन करने के पूर्व तथा पश्चात् हाथ धो कर कुल्ला अवश्य करें।

2. नाखून छोटे रखें।

3.त्वचा का ध्यान रखें।स्वच्छ जल से स्नान करें, साफ और सूखी तौलिया से शरीर पोछें तथा साफ और सूखे वस्त्र धारण करें।

4.इस समय कई लोगों को खाँसी, ज़ुखाम और मौसमी बुखार इत्यादि होता है इसलिये लोगों से हाथ न मिलायें और गले नहीं मिले। 

5. भीड़  वाली जगह जाते समय मास्क का उपयोग करें।

6.गर्म अथवा गुनगुने पानी से स्नान करें।

7. स्नान करने के पूर्व अभ्यंग अर्थात शरीर में मालिश करें। मालिश करने के लिये तिल के तेल का उपयोग करें।

8. अभ्यंग के उपरांत बेसन, हल्दी और देसी गाय के दूध से बने उबटन से शरीर के तेल को हटायें फिर गर्म /गुनगुने पानी से स्नान करें।

9.  प्रातःकाल खाली पेट पवन मुक्तासन करें।

10.सायंकाल अथवा रात्रि भोजन के बाद शतपदी करें अर्थात 100 कदम धीरे-धीरे टहलें।

11. सायंकाल अथवा रात्रि भोजन के बाद  वज्रासन करें।

12. सोते समय सबसे पहले वामकुक्षी आसन करें (कुछ देर बायें करवट ले कर लेटें)।

वर्षा ऋतु और आधुनिक खाद्य विज्ञान:

चूँकि इस माह में वातावरण में अधिक नमी और तापमान दोनों ही विद्यमान होते हैं अतः :

1. खाद्य पदार्थ तथा जल दोनों को ही सूक्ष्मजीव बड़ी सरलता से प्रदूषित करते हैं । इस कारण, इस माह में सिर्फ रसोई में बना ताज़ा और गर्म आहार का ही सेवन करें।

2. इस माह में खाद्य प्रसंस्करण नहीं करें अर्थात, जैम जैली, मुरब्बा और अचार इत्यादि न बनायें। 

3. भंडारित प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों बरनियों को इस माह में नहीं खोलें।


ध्यान दें:

उपरोक्त परामर्श सिर्फ स्वस्थ्य व्यक्तियों के लिये है । किसी भी प्रकार की चिकित्सा के लिये कृपया चिकित्सक से सम्पर्क करें ।


निवेदन :
कृपया लेख सम्बन्धी अपने विचार और सुझाव कमेंट बॉक्स में अंकित कर प्रोत्साहित करें।

प्रियतम अवतार मेहर बाबा की जय जय जिनेंद्र सदा
💐💐💐💐💐💐💐

🙏🏻🌈🌈😇😇🙏🏻
सादर 
मेहेर न्यूट्रीशन  

संदर्भ :

१.      The Ayurvedic Diet - Banyan Botanicals: https://www.banyanbotanicals.com 

२.      Traditional methods of food habits and dietary preparations in Ayurveda, The Indian System of  Medicine: https://journalofethnicfoods.biomedcentral.com › articles

३.      Ayurveda for Everyone: https://www.youtube.com/channel/UCjKTHeGY67SWFlTnxvfdlOg

४.       Traditional Knowledge Digital Library (TKDL): http://tkdl.res.in/tkdl/langdefault/Siddha/Sid_Principles.asp?GL=Eng

Thank You for writing. Please keep in touch. Avtar Meher Baba Ki Jai Dr. Chandrajiit Singh

गुरुवार, 8 अगस्त 2024

सावधानियाँ तथा पाचन को दुरुस्त करने के लिये आहार सम्बन्धी अनुशंसा

🌻🌼🍀🌻🌼☘️
वर्षा ऋतु में वातावरण में अधिक नमी तथा मध्यम तापमान होता है जिस कारण सूक्ष्मजीव अधिक पनपते हैं जो कि आहार तथा जल को प्रदूषित करते हैं। साथ ही, आयुर्वेद के अनुसार इस ऋतु में जठराग्नि सबसे मंद होती है जिसके फलस्वरूप यदि आहार विहार में थोड़ी सी लापरवाही बरती जाये तो पाचन खराब जो सकता है। पाचन दुरुस्त करने के लिये निम्नलिखित उपाय अपनाये जा सकते हैं :

सावधानियाँ तथा पाचन दुरुस्त करने की उपाय:
1.उबले पानी का सेवन करें। पानी जब उबलना प्रारम्भ हो उसके बाद 21 मिनट (लगभग आधा घंटा) और उबालें। फिर पानी को ठंडा कर स्वच्छ पात्र में रखें, जब आवश्यकता हो तब सेवन करें।

 2. सिर्फ ताज़ा, तुरंत बने आहार का ही सेवन करें।

 3. सादे तथा ठंडी तासीर के, घर की रसोई में बने भोजन का सेवन करें जैसे खिचड़ी। गर्म तासीर और गरिष्ठ तासीर के बने भोजन का सेवन नहीं करें जैसे दूध।

 4. साबूदाने की खिचड़ी का सेवन अथवा कच्चे साबूदाने का सेवन और कच्चे केले का सेवन लाभकारी होता है क्योंकि इसमें स्टार्च होता है जो कि पानी को सोख कर पेट को बाँध देता है।

5.चावल (बिना पसाया हुआ, ऐसे चावल में स्टार्च विद्यमान होता है) और मूँग की दाल (सर्वाधिक सुपाच्य दाल, क्योंकि इस दाल में ट्रिप्सिन अवरोधी कारक  सभी दालों में सबसे कम होता है साथ ही प्रोटीन उपस्थित होती है) से बनी खिचड़ी का सेवन, जब आवश्यकता हो तब करें।

6. यदि पाचन खराब हो तो कुछ-कुछ देर में, आवश्यकतानुसार स्वच्छ जल में तैयार नमक और शक्कर का घोल, अथवा स्वच्छ जल में तैयार ओ.आर.एस. के घोल का सेवन करते रहें।

7. व्यक्तिगत स्वच्छता का विशेष ख्याल रखें, हाथ और पैर के नाखून समय समय पर काटें, इन्हें छोटे और साफ रखें।

8. खाना बनाने, खाने के पहले और खाने ले बाद हाथों को स्वच्छ जल तथा साबुन से अच्छी तरह से धोयें।

9. जल्द से जल्द चिकित्सक से परामर्श लें

कृपया ध्यान दें : 
उपरोक्त परामर्श मात्र आहार संबंधी हैं। चिकित्सक द्वारा बताई गई दवाईयाँ समय पर लेते रहें।

आग्रह:
लेख संबंधी अपने विचार तथा सुझाव नीचे दिये गये कमेंट बॉक्स में अवश्य अंकित करें तथा प्रोत्साहित करें।

सादर
प्रियतम अवतार मेहेरबाबा की जय जय जिनेन्द्र सदा
🙏🏻🌈🌈😇😇🙏🏻

Thank You for writing. Please keep in touch. Avtar Meher Baba Ki Jai Dr. Chandrajiit Singh

गुरुवार, 6 जुलाई 2023

वर्षा ऋतु के श्रावण (सावन) माह में आहार विहार

क्या वर्षा ऋतु में आपके  हाथ, पाँव  और जोड़ों में दर्द होता है अथवा अपच, गैस, मन एकाग्रचित्त न होना, किसी काम में मन न लगना, उदासी, अनावश्यक चिंता और भय होना, नींद कम आना होता है और यदि आप इस विषय में आहार-विहार के माध्यम से सुधार चाहते  हैं, तो प्रस्तुत लेख को पढ़ें-

जवाहर किसान प्रस्तुति

द्वारा: डॉ . किंजल्क सी.सिंह तथा डॉ. चंद्रजीत सिंह

कृपया ध्यान दें: लेख के आखिर में  कमेंट बॉक्स में आप अपना विचार लिख कर व्यक्त कर सकते हैं, अधिक जानकारी के लिये आप अपना नाम और मोबाईल नम्बर भी कमेंट बॉक्स में छोड़ सकते हैं - सादर 💐💐

ग्रीष्म ऋतु पूर्ण हो चुकी है तथा विसर्ग काल में वर्षा ऋतु प्रारंभ हो चुकी है। यह चातुर्मास का भाग है जो की व्रत, उपवास, ध्यान, पूजन, संयम और शाकाहार का समय है। इस ऋतु के दो भाग हैं श्रावण और भाद्रपद। श्रावण माह में फुहार के रूप में निरंतर वर्षा होती है जो की प्रकृति हेतु अत्यंत पोषक होती है। वातावरण में नमी बढ़ती है और तापमान कम होता है। परिवर्तित होती ऋतु के अनुसार आहार–विहार संयम और अनुशासन रखने से शरीर संतुलित और स्वस्थ रहता है। इस हेतु निम्नलिखित अनुशंसाओं का पालन लाभकारी हो सकता है।

अ. वर्षा ऋतु एवं दोष: 

वर्षा ऋतु में शरीर में: 

1.वात दोष प्रकुपित होता है। 

2.पित्त दोष संचित होता है।

ब. वात प्रकुपन का शरीर पर प्रभाव:

शरीर में वात दोष की वृद्धि के कारण:

1. शरीर में भारीपन लगता है।

2.शरीर के विभिन्न अंगों में तथा शरीर के जोड़ों में दर्द होना, जकड़न होना, जोड़ों में कटकटाने की आवाज़ होना ।

3.  रक्तचाप में परिवर्तन होना। 

4. शरीर में आलस्य होना।

5. शरीर दुबला होना।

6. त्वचा अथवा /बालों का रुखा होना ।

7. शरीर में गैस बन सकती है तथा डकार इत्यादि आ सकती है। 

8. मल कड़ा हो सकता है, मल त्याग कठिन हो सकता है और कब्ज़ जैसी समस्यायें हो सकती हैं।

9. मन उड़ान लेता है कल्पनायें करता है, इसका लाभ लेते हुये ज्ञानात्मक तथा रचनात्मक गतिविधियों में शामिल हों दूसरी ओर मन एकाग्रचित्त नहीं हो पाता है और कभी-कभी उलझनों का सामना करना पड़ सकता है। कभी-कभी मन में उदासी होना। मन में घबराहट, अनावश्यक चिंता होना और नींद कम आना।

10.चक्कर आना, स्पॉन्डिलाइटिस होना।

11. बहुत अधिक भूख लगना अथवा बिल्कुल भूख लगना। 

12.ठंड लगना।

स. वात की प्रकृति:

1.वात की प्रकृति ठंडी होती है।

2.वात की प्रकृति रूखी होती है।

द. वात को संतुलित करने वाले आहार का प्रकार: 

1.आहार गर्म तासीर का होना चाहिये, ठंडा नहीं।

2.आहार स्निग्ध होना चाहिये, रूक्ष (रूखा) नहीं।

3.आहार लघु अर्थात पचने में हल्का होना चाहिये गरिष्ठ अर्थात पचने में कठिन और भारी नहीं होना चाहिये।

4. घर की रसोई का बना गर्म खाना ही खायें ।

5. पके भोजन का ही सेवन करें, कच्चे भोजन का सेवन नहीं करें। हरी पत्तेदार सब्ज़ियों का सेवन नहीं करें।

इ. वर्षा ऋतु में अनुशंसित अननुशंसित आहारीय रस (स्वाद) :

अनाज, दलहन, तिलहन, सब्ज़ी, फल, दूध एवं दुग्ध उत्पाद इत्यादि का आहार तैयार करने के लिये चुनाव निम्नलिखित आहार रस के नियम के आधार पर ही करें:

1. वात को शरीर में संतुलित रखने के लिये मीठे, नमकीन और खट्टे रस के आहार का सेवन करें। 

2. वर्षा ऋतु में कड़वे, तीखे और कसैले रस की आहार का सेवन नहीं करें। 

3. वात में वृद्धि करने वाले आहार का सेवन नहीं करें बल्कि वात को कम करने वाले आहार का सेवन करें। 

प. पथ्यकर तथा अपथ्यकर खाद्य पदार्थ:

विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ जिनका सेवन वर्षा ऋतु में किया जा सकता है, वह इस प्रकार हैं:

सब्ज़ियाँ: 

1.वर्षा ऋतु में बेल वाली सब्ज़ियाँ जैसे लौकी, कुम्ड़ाह, गिल्की, तरोई, परवल, भिंडी, टिंडा, खीरा, ककड़ी इत्यादि का सेवन हितकर है। 

2.आलू,  साबूदाना, बैंगन, गोभियाँ, मूली, फलियाँ, साग और कंद का सेवन नहीं करना चाहिये।

3.यदि साग का सेवन करना ही हो तो, साग को साफ कर, धो कर, पानी में उबाल लें। इसके उपरांत साग को पानी से निकाल कर रस निचोड़ कर अलग कर दें फिर कम तेल में भून लें। अब इस साग की सब्ज़ी बनायें।

ध्यान दें : बेल वाली सब्जियों हाँलाकि ठंडी तासीर की होती हैं किंतु सुपाच्य भी होती हैंं इसीलिये वर्षा ऋतु में इनका सेवन हितकर होता है। वर्षा ऋतु में इन्हें कच्चा नहीं खायें साथी कच्ची सब्ज़ियों का रस नहीं पियें। सब्ज़ी बनाने के लिये तेल की थोड़ी मात्रा अधिक लें तथा गर्म मसालों का उपयोग करें।

फल: 

1.सेब, केला, देसी पका आम, नाशपाती, अनार इत्यादि का सेवन किया जा सकता है।

2.खरबूज़, तरबूज़ इत्यादि का सेवन नहीं करें।

अनाज: 

1.वर्षा ऋतु में गेहूँ की तरह स्निग्ध और जौ जैसे अनाज का सेवन किया जाना हितकर है। नये अनाज का उपयोग नहीं करें बल्कि कम से कम एक वर्ष पुराने अनाज का उपयोग करें। साथ में देसी गाय के दूध से बने घी का उपयोग करें।

2.वर्षा ऋतु में चावल का सेवन नहीं करें। यदि चावल का सेवन करना ही है तो नये चावल का सेवन नहीं करें बल्कि कमसेकम एक वर्ष पुराने चावल का सेवन करें। यदि नये चावल का सेवन करना ही हो तो पहले नये चावल को भून लें फिर खुले बर्तन में पकाने के बाद, माड़ हटा कर इसका सेवन करें। ऐसा चावल पचाने में हल्का होता है। चावल का सेवन दिन में करें।

दस्त के उपाय के रूप में चावल के माड़ का उपयोग किया जा सकता है। माड़ को तैयार करने की विधि निम्नानुसार है –

चावल + चौदह गुना पानी + उबाल लें + छान लें + माड़ तैयार पायें

तैयार माड़ + छौंका (शुद्ध देसी घी + ज़ीरा + कढ़ी पत्ता + कोकम + किसा अदरक + स्वादानुसार सेंधा नमक) (कोकम खट्टा होने के बाद भी पित्त नहीं बढ़ाता है।)

3. मोटा अनाज तथा लघुधान्य प्रकृति में खुश्क होते हैं अतः वात दोष में वृद्धि कर सकते हैं। वर्षा ऋतु में इनके सेवन की मनाही है। यदि इनका सेवन करना ही हो तो साथ में देसी गाय के दूध से बने शुद्ध घी का उपयोग अवश्य करें।

दालें:

1. हरी छिल्के वाली मूँग की दाल का सेवन श्रेष्ठ होता है।

2. पतली अरहर की दाल का भी सेवन किया जा सकता है। 

3. इन दालों में शुद्ध देसी घी से छौंका लगा कर सेवन करना हितकर होता है। 

4. सोयाबीन, उड़द मसूर की दाल मटर, चने और छोले जैसी गरिष्ठ दालों का सेवन न करना हितकर होता है।

तेल और घी का उपयोग: 

1. अधिक तेल और घी में बने आहार का सेवन नहीं करें बल्कि तेल अथवा देसी गाय के दूध से बने घी का उपयोग आहार में ऊपर से अवश्य करें जैसे दाल और सब्ज़ी में ऊपर से तेल अथवा शुद्ध देसी घी को डालना, रोटी में शुद्ध देसी घी लगाना। शुद्ध देसी घी से पित्त नियंत्रित होता है तथा तेल वात को कम करने के लिये काम आता है।

2. अभ्यंग (मालिश) कर, वात को नियंत्रित करने के लिये तिल का तेल श्रेष्ठ है। तिल के तेल के अलावा सरसों के तेल का भी उपयोग किया जा सकता है।

मसाले:

1. गर्म मसालों का उपयोग करें जैसे काली मिर्च, लौंग, बड़ी इलायची / काली इलायची, दालचीनी, मेथी दाना, तेजपत्ता, जायफल, सोंठ, जावित्री शाही जीरा / काला जीरा, राई दाना, चक्रफूल और कलौंजी।

2. ठंडे मसालों का उपयोग नहीं करे जैसे, हरी सौंफ, साबुत धनिया, सफेद जीरा, पुदीना, खसखस और अनारदाना।

मेवे:

गर्म मेवे: बादाम, अखरोट, काजू, पिस्ता, मुनक्का, तिल, मुँहफली और खजूर।

कृपया ध्यान दें: यदि मेवों को हल्के गुनगुने दूध, गाय के घी या चुटकी भर सोंठ/इलायची के साथ लिया जाए, तो इनका वात-शामक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

बिना भिगोए या अत्यधिक भुने हुए (dry roasted) मेवे खाने से उनमें रूखापन आ सकता है, जिससे वात शांत होने के बजाय बढ़ भी सकता है।

ठंडे मेवे: ताज़ा हरा नारियल, सूखा नारियल, नारियल का पानी और नारियल की मलाई, खसखस, मखाना, चिरौंजी, कद्दू, खीरा, तरबूज़ और खरबूज़ के बीज। 

कृपया ध्यान दें:

यदि मेवों को रात भर पानी में भिगो कर रखा जाये तो इनकी उष्णता में कमी आ जाती है। सौंफ तथा अन्य मेवों का यदि सुतली वाली मिश्री के साथ सेवन किया जाये तो भी उष्णता में कमी लाई जा सकती है।

दूध एवं दुग्ध उत्पाद: 

1.वर्षा ऋतु में, पाचन दुरुस्त होने की स्थित में स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ देसी गाय के दूध का सेवन कर सकता है। दूध में थोड़ी सी सोंठ का चूर्ण मिला कर सेवन करना हितकर होता है।

2. इस ऋतु में भैंस के दूध का सेवन नहीं करें, यह गरिष्ठ होता है। 

3. इस ऋतु में, खोवा पनीर और चीज़ का उपयोग नहीं करें यह गरिष्ठ होते हैं।

4. सावन माह में कभी–कभी दही का सेवन किया जा सकता है। दही तासीर में गर्म होता है किंतु ध्यान रखियेगा कि खीरे और दही का रायता, अथवा दही और उड़द की दाल से बने दही बड़े का सेवन नहीं करें।

5. पतले, देसी गाय के दूध से बने ऐसे ताज़े छाछ का सेवन करें जो की खट्टा नहीं हो। छाछ संबंधी अधिक जानकारी आगे लेख में दी गई है।

6. वर्षा ऋतु में सीमित मात्रा में देसी गाय के दूध से बना घी का, आहार के साथ सेवन करना हितकर होता है।

अन्य खाद्य पदार्थ: 

श्रावण में शाकाहार का ही सेवन करें। यह सुपाच्य होते हैं। माँसाहार जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करें यह गरिष्ठ होते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में पेय जल का उपयोग: 

1. पानी उबालते समय चौथाई अथवा आधा चम्मच अजवाईन अथवा ज़ीरा अथवा 1 अथवा 2 काली मिर्च अथवा 2 लौंग अथवा सोंठ का छोटा टुकड़ा 1 लीटर पानी में डाल कर तब तक उबालें जब तक पानी की मात्रा आधी हो जाये। अब इस पानी को छान लें। इस तरह से तैयार पानी को ठंडा कर अथवा गुनगुना भी पिया जा सकता है। ऐसा करने से औषधीय जल तैयार होगा जिसके सेवन से शरीर में वात संतुलित रहेगा।

2. वर्षा ऋतु में शुद्ध जल को उबालकर ठंडा करें फिर एक गिलास पानी में 1 चम्मच पुराना शहद मिला कर सेवन करना भी हितकर होता है।

3. गुनगुने पानी का ही सेवन करें, सामान्य तापमान अथवा ठंडे पानी का सेवन नहीं करें।

आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में पाचक अग्नि की स्थिति:

श्रावण माह में पाचक अग्नि कभी तीव्र हो जाती है कभी कम हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप कभी भूख तेज़ लगती है, कभी भूख कम अथवा नहीं लगती है। अतः वर्षा ऋतु में सतर्कतापूर्वक आहार ग्रहण करें। जब भूख लगे तभी भोजन पायें।

पाचक अग्नि बढ़ाने के लिये उपाय: 

1. खाने के पूर्व सोंठ पर नमक लगाकर चबा–चबा कर खायें।

2. रोटी पर, चावल, दाल और सब्ज़ी में ऊपर से घी और तेल डाल का खायें।

3. खाने में ताज़ा दही और पतला छाछ, जो खट्टा नहीं हुआ हो, कम मात्रा में खाया जा सकता है। छाछ को काली मिर्च + पीपली + सोंठ का त्रिकटु चूर्ण का 2 से तीन चुटकी डाल सकते हैं। अब दही को ज़ीरा + कढ़ी पत्ता + हींग से छौंक सकते हैं और स्वादानुसार काला नमक भी डाला जा सकता है।

4.सोंठ चूर्ण + गुड़ + शुद्ध देस घर में बना घी मिला कर छोटा लड्डू बना कर सेवन करें, इससे पाचन अच्छा होगा।

5.अचार और मूँग के पापड़, पुदीने की चटनी का सेवन कर सकते हैं।

आहार एवं स्वर विज्ञान: 

1.भोजन तब ग्रहण करें जब आपकी सूर्य नाड़ी अथवा स्वर चल रहा हो  अर्थात नाक के दाहिने छिद्र से वायु का आवागमन अधिक हो।

2. जl सहित अन्य पेय पदार्थ तब ग्रहण करें जब आपकी चंद्र नाड़ी अथवा  स्वर चल रहा हो  अर्थात नाक के बायें छिद्र से वायु का आवागमन अधिक हो।

3.यदि आपको कोई विशेष स्वर प्रारम्भ करना हो तो उस नासिका के विपरीत दिशा की करवट लेकर कुछ देर लेट जायें, उदाहरणस्वरूप यदि आपको दाहिना स्वर प्रारम्भ करना हो तो बायें करवट ले कर कुछ देर लेट जायें।

आहार के बाद: 

देसी पान का सौंफ,अजवाईन, लौंग, जावित्री और इलायची इत्यादि के साथ सेवन कर सकते हैं। यह आहार के पाचन में सहायक होते हैं।

आहार कब और कितना करें: 

चूँकि वर्षा ऋतु में पाचक अग्नि मंद होती है अतः –

1.भूख लगने और भूख खुलने पर ही आहार लें।

2.पूरी तरह पेट भर कर आहार नहीं लें, बल्कि आधा पेट भोजन करें, एक चौथाई पेट पेय पदार्थ एवं पेय जल से भरें तथा बाकी एक चौथाई पेट को वायु संचरण के लिये रखें ।

3.सुबह का भोजन प्रातः काल 10 बजे से दोपहर 2.00 बजे के मध्य कर लें, दूसरी बार हल्का भोजन सूर्यास्त के पूर्व शाम भोजन ग्रहण करें। इस समय इंसुलिन का स्राव होता है जो पाचन में सहायता करता है । सूर्य की उपस्थिति में शरीर में तांबे के कारण भोजन भली-भाँति पचता है।

अनुभवजन्य अनुशंसा:

1. श्रावण माह में हरड़ (हरितकी) के सेवन की अनुशंसा है  जिसकी प्रकृति गर्म होती है तथा यह लघु (पचने में हल्का होता है)। सेवन की विधि: हरितिका चूर्ण 1 से 2 ग्राम + सेंधा नमक + ऊपर से गुनगुने पानी सेवन करें। यह, वायु के अनुमोलन के लिये पेट अच्छे से साफ होने के लिये लाभकारी है।

2. श्रावण माह में हरी पत्तेदार सब्जियाँ, साग और नींबू के सेवन का निषेध है।

उपवास (लंघणम): 

चूँकि वर्षा ऋतु में पाचन तंत्र असंतुलित रहता है अतः पाचन भली भाँति नही हो पाता है जिस कारण शरीर में अपच आहार टॉक्सिन्स (अवांछित विपोषक तत्व) बना सकते हैं, जिनकी शरीर से बाहर निकालना आवश्यक है। शास्त्रों मे कहा गया है  'लंघणम परम औषधम अर्थात उपवास परम औषधि है जिससे ने केवल पाचन तंत्र को आराम मिलता है बल्कि शरीर की आंतरिक सफाई भी होती है। इसी लिये श्रावण माह में प्रति सप्ताह सोमवार को उपवास का विधान है।

आधुनिक आहारीय ज्ञान:

वर्षा ऋतु में अपच होना, अजीर्ण होना, पित्त बढ़ना (एसिडिटी होना) पेट खराब होना, दस्त लगना, बुखार आना, गैस बनना, शरीर और जोड़ों में हल्का दर्द और ऐंठन होना और किसी कार्य में मन नहीं लगना। यदि यह सब लक्षण दिखें तो नीचे दिये गये उपाय अपना सकते हैं -

1. शुद्ध पेय जल का ही सेवन करें। पेय जल को पहला उबाल आने के बाद 21 मिनट तक उबालें, फिर ठंडा कर साफ धुले हुये सूती के कपड़े से छान कर सेवन करें।

2. वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी और गर्मी की अधिकता के कारण सूक्ष्मजीवों की संख्या और गतिविधि तेजी से बढ़ती है जो की आहार को जल्द ही दूषित कर सकते हैं, अतः ताज़े और तापमान में गर्म आहार के सेवन की अनुशंसा है। रखे हुये बासी और ठंडे भोजन का सेवन कतई नहीं करें।

3. बाहर बने आहार की गुणवत्ता के प्रति आश्वस्त होना कठिन है अतः घर की रसोई में तैयार आहार का ही सेवन करें।

4. भोजन और पानी को हमेशा ढक कर रखें।

5. वर्षा ऋतु में चूँकि आसमान में बदली रहती है और सूर्य की किरणें सीधे हमारे त्वचा पर नहीं पड़ती जिसके फलस्वरूप शरीर में विटामिन-डी का निर्माण नहीं हो पाता जिससे शरीर में कैल्शियम का अवशोषण कम हो जाता है। विटामिन - डी की कमी के कारण आँतों द्वारा विटामिन-बी का अवशोषण कम हो जाता है। इस वजह से शरीर में विटामिन-बी के कुछ प्रकार की भी कमी हो जाती है । 

यदि ऊपर दिये गये लक्षण आपको प्रतीत होते हैं तो अपनी न्यूट्रीशनल प्रोफ़ाइलिंग (रक्त की जाँच) करवा सकते हैं। यदि विटामिन-डी, कैल्शियम और विटामिन-बी अथवा किसी भी अन्य तत्व की कमी पता लगती है तो इनके आहारीय स्त्रोतों और आवश्यक होने पर पूरक गोलियों का सेवन चिकित्सक अथवा प्रशिक्षित डायटीशियन / न्यूट्रीशनिस्ट / न्यूट्रीशन कोच की सलाह से ले सकते हैं, इस तरह हडि्डयों, जोड़ों और तंत्रिका तंत्र में कमी को दूर किया जा सकता लाई है और साथ में अपच अन्य लक्षणों को भी सुधारा जा सकता है।

वर्षा ऋतु एवं विहार:

1. वात के निवारण हेतु शरीर में स्नान के पूर्व तिल के तेल की मालिश की जा सकती है।

2. गर्म अथवा गुनगुने पानी से स्नान करें।

3. स्नान करने के पूर्व अभ्यंग अर्थात शरीर में मालिश करें। मालिश करने के लिये तिल के तेल का उपयोग करें।

4. अभ्यंग के उपरांत बेसन, हल्दी और देसी गाय के दूध से बने उबटन से शरीर के तेल को हटायें फिर गर्म /गुनगुने पानी से स्नान करें।

5. त्वचा विकार से बचने हेतु 100 ग्राम नारियल के तेल में 5 ग्राम कपूर मिला कर स्नान के बाद शरीर पर लगाया जा एकता है। घमौरियाँ हों तो हल्दी चूर्ण और कपूर मिला कर लगायें। 

6. वात के कारण मन को एकाग्रचित्त करना कठिन होता है। मन को एकाग्रचित्त करने के लिये ध्यान–पूजन करना लाभकारी हो सकता है। 

7. अधिक व्यायाम करने से वात में वृद्धि हो सकती है अतः हल्का फुल्का व्यायाम ही करें।

8. दिन में निद्रा नहीं लें।

9. समय–समय पर नाखून काटें, खाना खाने के पहले और बाद में साबुन और साफ पानी से हाथ धोयें, कुल्ला करें, सुबह और शाम मंजन करें, रोज़ साफ पानी और साबुन का उपयोग कर स्नान करें, साफ, धुले हुये तथा इस्त्री किये हुये वस्त्र धारण करें।

10. ए.सी. और कूलर का उपयोग तथा छत पर ठंडी हवा में निद्रा लेना अब बंद कर देना चाहिये क्योंकि क्योंकि ठंडी हवा से वात दोष में वृद्धि होती है।

11. मच्छरों और कीड़ों से बचने के लिये मच्छरदानी का प्रयोग करें।

12. वर्षा में भीगें नहीं, कीचड़ से बचें, अंधेरे में न जायें।

13.साफ और सूखी तैलिये का ही उपयोग करें और ऐसे ही वस्त्रों को धारण करें।

14. छाता, बरसाती, बरसाती चप्पल और जूते तथा टॉर्च, लालटेन का उपयोग करें। आवश्यकतानुसार घर की मरम्मत करवायें, घर साफसुथरा रखें और घर के आसपास पानी एकत्रित नहीं होने दें जिससे, मच्छर, मक्खी और कीट–पतंगे पैदा नहीं होंगे।

15. इस मौसम में मन प्रफुल्लित, कल्पनाशील और सृजनात्मक हो जाता है, इस अवसर का लाभ लेते हुये सृजनात्मक गतिविधियों जैसे लेखन, शिल्पकला, चित्रकला, गायन, सिलाई और कढ़ाई इत्यादि में भाग लेना हितकर होता है।

वात नियंत्रण करने के लिये आसन:

1. प्रातःकाल खाली पेट पवन मुक्तासन करें।

2. सायंकाल अथवा रात्रि भोजन के बाद शतपदी करें अर्थात 100 कदम धीरे-धीरे टहलें।

3.सायंकाल अथवा रात्रि भोजन के बाद  वज्रासन करें।

4. सोते समय सबसे पहले वामकुक्षी आसन करें (कुछ देर बायें करवट ले कर लेटें)।

वात नियंत्रण करने के लिये ध्यान पूजन:

वात के प्रभाव के कारण मन में चिंता, भय, बेचैनी अथवा उदासी हो सकती है। मन पर काबू पा कर भी वात को नियंत्रित किया जा सकता है। 

इसलिये ध्यान, पूजन और प्राणायाम जैसे सात्विक अभ्यास, ईश्वर पर श्रद्धा तथा मन को समझाने जैसा सजग प्रयास भी लाभकारी होते है। इसीलिये श्रावण मास में पूजन पाठ अधिक किया जाता है।

वर्षा ऋतु और आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण:

चूँकि इस माह में वातावरण में अधिक नमी और तापमान दोनों ही विद्यमान होते हैं अतः :

1. खाद्य पदार्थ तथा जल दोनों को ही सूक्ष्मजीव बड़ी सरलता से प्रदूषित करते हैं । इस कारण, इस माह में सिर्फ रसोई में बना ताज़ा और गर्म आहार का ही सेवन करें।

2. इस माह में खाद्य प्रसंस्करण नहीं करें अर्थात, जैम जैली, मुरब्बा और अचार इत्यादि न बनायें। 

3. भंडारित प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों बरनियों को इस माह में नहीं खोलें।

ध्यान दें: 

ऊपर दी गई अनुशंसा सिर्फ स्वास्थ्य व्यक्तियों के लिये है। अन्य व्यक्ति चिकित्सक से परामर्श लेने की कृपा करें।

संदर्भ: 

1.चरक संहिता सूत्रस्थान अध्याय 27

2. सुश्रुत संहिता सूत्रस्थान 45

3.अष्टांग हृदय सूत्रस्थान अध्याय 5

4. अष्टांग हृदय सूत्रस्थान अध्याय 6

सादर

प्रियतम अवतार मेहरबाबा की जय, जय जिनेंद्र 

Thank You for writing. Please keep in touch. Avtar Meher Baba Ki Jai Dr. Chandrajiit Singh