पोषक तत्व विपोषक तत्व:
डिस्क्लेमर:
यह लेख सिर्फ जानकारी के लिये है, कृपया किसी भी प्रकार के आहारीय परिवर्तन के पूर्व चिकित्सक अथवा न्यूट्रीशनिस्ट से राय अवश्य ले लें।
पोषण आहार, आयुर्वेदिक आहारीय नियम तथा आहारीय पारम्परिक ज्ञान सम्बंधी पोस्ट के लिए आपका हार्दिक स्वागत है.
पोषक तत्व विपोषक तत्व:
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बच्चों के
जीवन की नींव जो गर्भावस्था और प्रथम 2 वर्ष की उम्र अर्थात प्रथम 1000 दिन में
पड़ती है. इस समय गर्भवती स्त्री, धात्री माँ एवं शिशु के स्वास्थ्य का ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है. अगर
माँ स्वस्थ्य रहेगी तो शिशु भी स्वस्थ्य रहेगा. इन १००० दिवस को भाग में विभक्त
किया जाता है. यह हैं:
1. गर्भावस्था के 270 (दो सौ सत्तर दिन)
2.बच्चे के जन्म के दो साल अर्थात 730 दिन (सात सौ तीस दिन).
शिशु के समान्य विकास
हेतु गर्भवती एवं धात्री माँ के लिये आवश्यक पोषक तत्व:
1. लौह तत्व:
गर्भस्थ शिशु के शारीरिक अंगों के विकास तथा उसके शरीर के अंगों के सुचारु रूप से कार्य करने हेतु लौह तत्व आवश्यक होता है. गुड़, पालक जैसी हरी भाजियाँ, सोयाबीन और सोयाबीन से बना पनीर (टोफू), विभिन्न दालें, कुम्ड़ाह के बीज, किनोआ, अनार, अंजीर, खजूर, किशमिश लोहे की कड़ाही में पकी सब्ज़ियों का सेवन करना आवश्यक होता है. लौह तत्व की आपूर्ति दैनिक आहार में इन चीज़ों को सम्मिलित कर और पूरक गोलियों (लौह तत्व की सप्लीमैंट गोलियाँ जो कि आँगनबाड़ी अथवा स्वास्थ्य केन्द्र से प्राप्त होती हैं) के सेवन से हो जाती है.
2. विटामिन सी:
शरीर द्वारा लौह तत्व के अवशोषण हेतु खट्टे फल जैसे नींबू, संतरा, मौसंबी, चकोतरा, करौन्दा, अमरूद, आँवले, अंगूर, कच्चा आम और टमाटर का सेवन अवश्य करें. जब भी लौह तत्व युक्त भोजन का सेवन कर रहे हों उस समय दूध, दूध के उत्पाद कैसे खीर, दही, पनीर, छाछ, चाय, कॉफी एवं सम्पूर्ण अनाज का सेवन नहीं करें क्योंकि यह शरीर में लौह तत्व के अवशोषण को घटा देते हैं.
3. फोलिक अम्ल:
फोलिक अम्ल पालक, प्याज़ के
पत्ते जैसी हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, मटर, चना, राजमा, पत्ता गोभी
(ब्रसल), ब्रॉकली (हरी गोभी), आदि हैं.
दैनिक आहार से प्राप्त होने वाले फोलिक अम्ल के अतिरिक्त, गर्भवती माँ को प्रति दिन इसकी पूरक गोली (सप्लीमैंट) के रूप में
ऊपर से करना चाहिये जिससे शिशु के भीतरी शारीरिक अंगों का विकास पूरी तरह से
हो पाये.
4. आयोडीन
युक्त भोजन:
गर्भस्थ शिशु तथा धात्री एवं गर्भवती माँ के थाईरॉईड हॉर्मोन के
निर्माण के लिये आयोडीन आवश्यक पौष्टिक तत्व है. थाईरॉईड हॉर्मोन के कारण शिशु तथा माँ का तंत्रिका तंत्र का विकास एवं
मनोवैज्ञानिक विकास अच्छा रहता है. आयोडीन युक्त नमक, आयोडीन
मिश्रित ब्रैड, दूध एवं दुग्ध उत्पाद, अंडे
एवं माँसाहार इत्यादि आयोडीन के अच्छे आहारीय स्त्रोत है.
माँ द्वारा संतुलित आहार का सेवन:
संतुलित आहार के लिये उचित मात्रा में अनाज से निर्मित उत्पाद, दाल, दूध और दूध से निर्मित
दुग्ध उत्पाद, अंडे और माँसाहार, फल
एवं सब्ज़ी और कम मात्रा में घी, तेल और मीठे का सेवन प्रति
दिन आहार में करना चाहिये. थाली में भोजन रंगबिरंगा होना चाहिये. जितने अधिक प्राकृतिक
रंग के भोज्य पदार्थ/व्यंजन सम्मिलित करेंगे आहार उतना
ही अधिक पौष्टिक होगा. ध्यान रखें कि अधिकाधिक भोज्य पदार्थ स्थानीय तौर हमारे
गाँव/कस्बे पर उत्पादित किये गये हों और मौसमी हों. ऐसा भोजन हमारे शरीर के लिये
पाचक होता है. ताज़ी सब्ज़ियों और फल की आपूर्ति हेतु घर पर ही रंगबिरंगी गृह वाटिका
ज़रूर लगायें.
शिशु का आहार:
1. जन्म के उपरांत शिशु का आहार:
प्रसव के पश्चात् 6 माह तक शिशु को केवल स्तनपान कराना चाहिये.
2.सातवें (7 वें) माह से की अवधि में:
दो से तीन (2 – 3) छोटे चम्मच नरम दाल – दलिया अथवा दाल – चावल अथवा दाल - रोटी मसलकर अर्ध ठोस (चम्मच से गिराने पर सरके, बहे नही), खूब मसले साग एवं फल, प्रतिदिन दो बार तथा दें। स्तनपान जारी रखें। नियमित स्तनपान भी जारी
रखें.
3.आठवें से नौवें (8-9 वें) माह से की अवधि में:
नरम दाल – दलिया अथवा
दाल - चावल अथवा दाल - रोटी, की धीरे - धीरे मात्रा
बढ़ायें. नियमित स्तनपान भी करायें. लगभग 2-3 बार आधी कटोरी भोजन दें.
टुकडों में नरम फल भी अवश्य दें. यदि मांस, मछली एवं
अण्डा खाते हैं तो उसे भी शामिल
करें.
4.नौवें से ग्यारवें (9-11 वें) माह की अवधि में:
नरम दाल - दलिया, दाल
- चावल, दाल - रोटी, प्रतिदिन
धीरे - धीरे मात्रा बढ़ाते हुए दें. अच्छी तरह कटे हुए फल एवं बिना मसला
आहार हुआ दिन में तीन बार दें . नियमित स्तनपान जारी रखें. एक बार में 250 मिली का कप/कटोरी भरकर आहार बच्चे को खिलायें.
5.बारवें माह से दो वर्ष (12 माह - 2 वर्ष) की अवधि में:
घर पर पका पूरा खाना, धुले एवं कटे फल, 3 भोजन तथा 2 नाश्ते के रूप में दें, एक बार में 250 मिली0 का कप भरकर आहार बच्चा प्रत्येक भोजन में
ग्रहण करें. स्तनपान के बीच में आहार देना चाहिए, नियमित
स्तनपान जारी रखें.
गर्भावस्था
के दौरान लिये जाने वाले महत्वपूर्ण कार्य:
1. गर्भावस्था की पहचान होने पर अतिशीघ्र निकटम स्वास्थ्य केन्द्र पर
जाकर पंजीकरण करना नियमित जाँच कराना.
2.पौष्टिक व संतुलित आहार का सेवन करना.
3. स्तनपान के सम्बन्ध में उचित जानकारी प्राप्त करना.
4.चिकित्सक द्वारा दिए गये परामर्शों का पालन करना.
सुनिश्चित करना:
1.जन्म के एक घंटे के भीतर बच्चे को स्तनपान कराना.
2.बच्चे को कोलस्ट्रम (प्रारम्भिक पीला दूध) बच्चे को पिलाना.
3. छह माह तक शिशु को केवल स्तनपान कराना.
4. छह माह तक के बाद ऊपरी आहार की शुरुआत करना
5.शिशु एवं बच्चे को नियमित स्वास्थ्य जाँच कराना.
6.शिशु एवं बच्चे का नियमित व समय से टीकाकरण कराना.
डिस्क्लेमर:
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आग्रह:
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सादर
प्रियतम अवतार मेहेरबाबा की जय जय जिनेन्द्र सदा !!!
Thank You for writing.
Please keep in touch. Avatar Meher Baba Ji Ki Jai !!!
वर्ष की छह ऋतुओं में से दो ऋतु, हेमंत तथा शिशिर में दो-दो माह अर्थात कुल चार माह होते हैं [अगहन माह, पौष (पूस) माह, माघ माह और फाल्गुन माह] जिनमें वातावरण का तापमान सबसे कम होता है तथा वायु रुक्ष होती है । शरीर के त्रिदोष में से वात का स्वभाव भी ठंडा और रुक्ष होता है । इन दो ऋतुओं के चार माहों में, विशेषकर 45 से 50 वर्ष की अवस्था से अधिक अवस्था के मनुष्य, वात से सर्वाधिक प्रभावित हो सकते हैं । हाँलाकि पूरे वर्ष में यही दो ऋतुयें सर्वाधिक स्वास्थ्यप्रद भी कहलाती हैं तथा पूर्ण रूप से स्वस्थ्य व्यक्तियों के लिये इन दो ऋतुओं में सभी छह रसों के भोज्य पदार्थों के सेवन की अनुशंसा आयुर्वेद की ओर से है ।
शरीर में तीन प्रकार के दोष, वात, पित्त और कफ विद्यमान
होते हैं । दरअसल यह दोष नहीं बल्कि ऊर्जायें होती हैं जो शरीर तथा शरीर की
क्रियाओं का संचालन करते हैं । स्वास्थ्य हेतु यह आवश्यक है कि इन तीनों ऊर्जाओं
को शरीर में संतुलित रखा जाये । त्रिदोष, शरीर को स्वस्थ्य रखने हेतु, विभिन्न
शारीरिक गतिविधियाँ संचालित करते हैं । इनमें से एक, वात दोष, वायु तथा आकाश तत्व
से निर्मित होता है । यह दोष शरीर के अंगों की विभिन्न गतिविधियों तथा रक्त प्रवाह
इत्यादि को संचालित करता है तथा शारिरिक क्रियाओं को गति प्रदान करता है । किन्तु,
शरीर में वात की वृद्धि (प्रकुपित होना) अथवा असंतुलित होने से वायु
सम्बंधी समस्या हो सकती है जिसे आयुर्वेद में वात अथवा आम
भाषा में बादी की समस्या कही जाती है ।
इन शारीरिक ऊर्जाओं को संतुलन में रखने हेतु बुद्धिमत्तापूर्वक
आहार का सेवन करना चाहिये, किंतु
इस प्रकार के आहारीय प्रबंधन करने के लिये, आयुर्वेद
तथा आहार विज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक है, इस उद्देश्य
हेतु, यह लेख
आपके समक्ष सादर प्रस्तुत है ।
शरीर में असंतुलित वात से सम्बन्धित समस्यायें :
शरीर में वात के प्रभाव के कारण निम्नलिखित समस्यायें हो सकती हैं :
वातज व्यक्तियों की पहचान:
वातज व्यक्तियों की पहचान उनके शारीरिक लक्षणों को देखकर की जा सकती है, जो कि इस प्रकार हैं :
ऋतु, समय, अवस्था तथा शरीर के भाग के अनुसार वात का प्रभाव:
ऋतु, समय, अवस्था तथा शरीर के
भाग के अनुसार वात का प्रभाव इस प्रकार है :
वात की सर्वोत्तम औषधि:
वात की सर्वोत्तम औषधियाँ इस प्रकार हैं :
आहारीय रसों (स्वाद) एवं अभ्यंग (तेल मालिश) तथा अन्य उपायों से वायु
दोष के संतुलन के उपाय :
आहार में छह प्रकार के रस
होते हैं । इन छह रसों का युक्तिपूर्वक
उपयोग कर के वायु को नियंत्रण किया जा सकता है :
स्वर अथवा नाड़ी विज्ञान एवं वात नियंत्रण:
स्वर अथवा नाड़ी विज्ञान एवं वात नियंत्रण का उपाय इस प्रकार है :
वायु प्रबन्धन हेतु आहार :
आहार, शरीर के दोषों में
वृद्धि अथवा शमन करते हैं । आहार का युक्तिपूर्वक सेवन कर दोषों को संतुलित कर
अच्छे स्वास्थ्य को प्राप्त किया जा सकता है । इसी प्रकार कुछ विशिष्ट प्रकार के
आहार के युक्तिपूर्वक सेवन करने अथवा कुछ अन्य प्रकार के आहार के सेवन नहीं करने
से शरीर में वात दोष को संतुलित किया जा सकता है जैसे यदि शरीर में वात प्रकुपित
हो तो वात की वृद्धि करने वाले आहार का सेवन नहीं करना चाहिये तथा वात का शमन करने
वाले आहार का सेवन करना चाहिये । यह विशिष्ट प्रकार के आहार इस प्रकार हैं :
वात की वृद्धि करने वाले फल :
सेब, आग में पकाया हुआ सेब, केला,
ब्लैकबेरी, सूखे फल, गूज़बैरी,
लीची, अनार, सातसुमा,
रभर्ब, रैस्पबैरी, कच्चा
केला, आँवला और कच्चा टमाटर ।
वात का शमन (कम) करने वाले फल :
एवोकैडो, चैरी, अँगूर, कीवी, मैलन (तरबूज़ अथवा खरबूज़), संतरा, पॉपॉ, पीच (आड़ू),
अनानास, प्लम (आलूबुखारा),
करौन्दा, पपीता और आग में
पकाया हुआ टमाटर इत्यादि ।
फल, जो न वात में वृद्धि करें और न ही शमन करे :
एप्रीकॉट (खुबानी), ग्रेपफ्रूट (चकोतरा), नींबू,
लाईम, आम, पियर
(नाशपाती) और स्ट्रॉबैरी ।
वात की वृद्धि करने वाली सब्ज़ियाँ :
बैंगन, बीन्स (फलियाँ), ब्रॉकली
(हरी गोभी), पत्ता गोभी, फूलगोभी,
मशरूम, प्याज़, पार्सले
(अजमोद), मटर, मिर्च, आलू, पालक, स्वीट कॉर्न,
मूली, शलजम, कुन्दरू, परवल और करेला ।
वात का शमन करने वाली सब्ज़ियाँ :
आर्टिचोक (हाथीचक), एस्पैरेगस (शतावरी), चुकन्दर,
गाज़र, ककड़ी, खीरा,
अदरक, लीक (हरा प्याज़), भिंडी,
पार्नसिप, स्वीड् (स्वीडन से आया एक प्रकार का
शलजम), वॉटरक्रैस (जलकुंभी) इत्यादि ।
सब्ज़ियाँ, जो न वात की वृद्धि करें और न ही शमन करे :
कूरगैट (ज़ुकनी अथवा लंबा
पीला कद्दू) ।
वात का शमन करने वाले मेवे एवं बीज:
शरीर में वात दोष की वृद्धि
करने वाले तथा न वात दोष की वृद्धि और न ही वात दोष का शमन करने वाले मेवे तथा बीज
आमतौर पर न के बराबर ही उपलब्ध होते हैं अत: इनका उल्लेख इस स्थान में नहीं किया
जा रहा है ।
वात दोष का शमन करने वाले
मेवे तथा बीज इस प्रकार हैं: बादाम, ब्राज़ील नट (ब्राज़ील देश में उत्पादित होने
वाला मेवा), काजू, नारियल, चिरौंजी, हेज़ल नट (कॉब नट और फिल्बर्ट के नाम से भी
जाना जाता है), मुँहफली, कुम्ड़ाह (कद्दू) का बीज, तिल का बीज, सूर्यमुखी का बीज
एवं अखरोट ।
अनाज, दलहन एवं तिलहन जो वात की वृद्धि करते हैं :
बीन्स (फलियाँ),बक व्हीट (एक
प्रकार का अनाज), दालें, मक्का, राई और सोयाबीन ।
अनाज, दलहन एवं तिलहन जो वात का शमन करते हैं :
ब्राऊन
ब्रैड, जई, पास्ता, बासमती चावल, ब्राऊन राईस (भूरा चावल), व्हाईट राईस (सफेद
चावल) और पीला चावल ।
अनाज, दलहन एवं तिलहन जो न वात की वृद्धि करते हैं न शमन करते हैं :
जौ ।
वायु तथा मोटा अनाज, अनाज, एवं तिलहन (मुँहफली) के उपयोग की विधि :
वायु तथा दाल के उपयोग की विधि :
लगभग सभी प्रकार की दालें स्वाद में कसैली तथा रुक्ष होती हैं एवं शरीर में वायु की वृद्धि करने वाली होती हैं अतः सभी दालों को घी अथवा तेल और हींग से छौंका लगा कर अथवा बघार कर सेवन करना चाहिये । गरिष्ठ अथवा भारी दालें हैं मसूर, उड़द, राजमा, मटर, तिवड़ा, सोयाबीन, लोबिया (चवली की दाल) चना और छोला । मूँग की दाल कम गरिष्ठ होती हैं अतः इसका सेवन किया जा सकता हाँलाकि यह भी हल्का वात को बढ़ाता है । अतः मूँग और कुल्थी की दाल के अतिरिक्त किसी भी अन्य दाल का सेवन ध्यानपूर्वक तथा सीमित मात्रा में करें । अरहर की दाल को खाने के पूर्व साबुत अरहर पर स्वच्छ पेय जल की कुछ मात्रा को छिड़ककर कुछ नम करें फिर हल्का भून लें। इस तरह तैयार साबुत अरहर को दलकर दाल बना लें। अब दाल को खुले बर्तन में पका कर तथा फेन को हटाने के बाद, घी अथवा तेल और हींग से छौंका लगा कर अथवा बघार कर सेवन करना चाहिये । दाल के उपयोग की विधि जानने के लिये कृपया निम्नलिखित लिंक को क्लिक करें :
वात की वृद्धि करने वाली मसाले :
इलायची, दालचीनी, लौंग और पुदीना ।
वात का शमन करने वाले मसाले :
जावित्री
(जायफल), इलायची, बड़ी इलायची, काली मिर्च, मिर्च, धनिया, ज़ीरा, सौंफ, अदरक, लहसुन,
केसर और ह्ल्दी ।
वात का शमन करने वाले मीठे :
शक्कर एवं भूरी शक्कर (शुगर ब्राऊन), गुड़, खांड अथवा देशी मिश्री ।
ऐसा मीठा जो न तो वात की वृद्धि करता है और न ही शमन करता है :
शहद न तो वात की वृद्धि करती
है और न ही शमन करती है ।
वात का शमन करने वाले तेल:
नारियल का
तेल, जैतून का तेल, तिल का तेल, सूर्यमुखी (सूरजमुखी) का तेल, मक्के का तेल, कुसुम
(सैफ्फ्लॉवर) का तेल, चिरौंजी का तेल, वनस्पति तेल, अखरोट का तेल और सरसों का तेल ।
वात की वृद्धि करने वाले दुग्ध तथा दुग्ध उत्पाद:
बकरी का दूध कुछ लोगों में वात की वृद्धि करता है क्योंकि बकरी के दूध का स्वाद हल्का सा कसैला होता है ।
वात का शमन करने वाले दुग्ध तथा दुग्ध उत्पाद:
मक्खन, कड़ा चीज़ (हार्ड चीज़), मुलायम चीज़ (सॉफ्ट चीज़), नीला चीज़ (ब्ल्यू चीज़,) गाय का दूध, अंडे का सफेद भाग, मार्जरीन, मेयोनेज़ दही (योगर्ट) । गाय का दूध, दही, पनीर, भैंस का दूध और भैंस के दूध से निर्मित घी ।
दुग्ध तथा दुग्ध उत्पाद, जो न वात में वृद्धि करें और न ही शमन करे:
कंडैंस्ड
दूध (गाढ़ा दूध जिसमें पानी की मात्रा को कम कर दिया गया हो), घी, बकरी का दूध, आईसक्रीम, कम मलाई का स्प्रैड
(मक्खन), सोयाबीन का दूध और अंडे का पीला भाग ।
वात की वृद्धि करने वाले अन्य पेय पदार्थ :
सेब का रस, कोला, नींबू का शर्बत, कॉफी और चाय (चाय के सेवन से जठराग्नि मंद हो जाती है जिससे आहार का पाचन पूरी तरह से नहीं हो पाता है) अतः धीरे-धीरे चाय के सेवन को रोक देना अच्छा होता है ।
वात का शमन करने वाले अन्य पेय पदार्थ:
संतरे का
रस, गर्म तरल चॉकलेट, मॉल्ट (सत्तू ) का पेय पदार्थ और मिनरल वॉटर (खनिज युक्त
बोतलबन्द स्वच्छ पेय जल) ।
वायु प्रबन्धन हेतु आहार लेने का उचित समय :
यदि आहार सही समय लिया जाये तो पाचन कार्य सुचारु रूप से होगा जिससे वायु कम बनेगी । आहार लेने का उचित समय इस प्रकार है :
वायु प्रबन्धन हेतु
पारम्परिक आहारीय ज्ञान :
चूँकि इस लेख में हेमंत एवं शिशिर ऋतु में होने वाली वात की समस्या के उपायों के बारे में विचार हो रहा है अतः शीत ऋतु के दो माहों अगहन एवं पौष (पूस) की परमपरागत् अनुशंसा इस प्रकार है:
हेमंत ऋतु के अगहन माह की
पारंपरिक एवं अनुभवजन्य आहारीय परामर्श :
हेमंत ऋतु के प्रथम, माह, अगहन में तेल
तथा तिलहन का उपयोग अधिक करना चाहिये स्निग्ध आहार का सेवन लाभकारी होता है जैसे
मुँगफली, तिल, अलसी, सोयाबीन, सूरजमुखी, जैतून
इत्यादि तथा इनके तेल में तले हुये व्यंजनों का सेवन करें । साथ ही ध्यान रखें कि
अगहन माह में ज़ीरे का सेवन नहीं करें क्योंकि ज़ीरा रुक्ष अर्थात रूखा होता है ।
हेमंत ऋतु के (पूस) माह में
पारंपरिक एवं अनुभवजन्य आहारीय परामर्श :
हेमंत ऋतु का द्वितीय माह
पौष (पूस) होता है. यह माह अगहन माह की तुलना में अधिक ठंडा होता है. इस मास में
भी, अगहन माह की ही तरह ही स्निग्ध आहार के अतिरिक्त
दूध के सेवन की अनुशंसा है किंतु ध्यान रखें कि इस माह में धने (धनिया मसाले) का
सेवन नहीं करें।
शिशिर ऋतु के माघ मास
हेतु पारम्परिक एवं अनुभवजन्य आहारीय अनुशंसा :
अनुभवजन्य एवं परम्परिक ज्ञान के अनुसार शिशिर ऋतु के माघ माह में घी और खिचड़ी के सेवन की अनुशंसा है किंतु इस माह में मसूर से बने व्यंजनों तथा खाद्य उत्पादों के सेवन का निषेध है ।
शिशिर ऋतु के फाल्गुन मास
हेतु पारम्परिक एवं अनुभवजन्य आहारीय अनुशंसा :
अनुभवजन्य एवं परम्परिक
ज्ञान के अनुसार शिशिर ऋतु के फाल्गुन माह
में प्रातः काल उठ कर स्नान करने की अनुशंसा है किंतु इस माह में चने, बेसन तथा इनसे बनने वाले व्यंजनों, खाद्य उत्पादों (नमकीन, पकौड़ा और ब्रैड पकौड़ा
इत्यादि) के सेवन का निषेध है ।
आधुनिक पोषण विज्ञान द्वारा वायु प्रबन्धन के उपाय :
आधुनिक
पोषण विज्ञान का उपयोग कर भी वात की समस्या का प्रबंधन किया जा सकता है । यह उपाय
निम्नानुसार हो सकते हैं :
पाचन दुरुस्त नहीं होने की पहचान :
यदि मुँह में छाले हो जाते हैं तो यह समझें कि पाचन दुरुस्त नहीं है और पाचन को दुरुस्त करने के लिये हल्का, सुपाच्य आहार (आसानी से पच सकने वाले आहार जैसे छिल्के वाली मूँग की दाल और चावल की खिचड़ी का सेवन करें तथा विटामिन-बी की पूरक गोलियों (सप्लीमैंट) का सेवन किया जा सकता है ।
पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने
के लिये आँतों में स्थित, मित्र सूक्ष्मजीव सहायक होते हैं । मित्र सूक्ष्मजीव को
सुचारू रूप से कार्य करने के लिये विटामिन-बी सहायता करती है । वायु की समस्या पाचन के दुरुस्त नहीं होने के
कारण भी हो सकती है । अतः, पाचन को
दुरुस्त कर वायु की समस्या (गैस्ट्रिक समस्या) का समाधान करने के लिये विटामिन-बी
के खाद्य स्त्रोत अथवा विटामिन -बी की पूरक गोलियों (जैविक अथवा रासायनिक गोलियाँ)
का सेवन भी लाभकारी सिद्ध हो सकता है । पूरक गोलीयों को सप्लीमैंट भी कहा जाता है ।
वायु तथा स्टार्चयुक्त आहार :
स्टार्चयुक्त
आहार के सेवन से वायु की समस्या में वृद्धि हो सकती है । इस समस्या का हल आहार से
स्टार्च को हटा देने में है । स्टार्चयुक आहार हैं आलू, चावल, साबूदाना और कच्चा
केला इत्यादि । यदि शरीर में वात दोष प्रकुपित हो तो इन भोज्य पदार्थ का सेवन नहीं
करें ।
आहार लेने के बाद वायु से मुक्ति के उपाय :
आहार लेने के बाद निम्नलिखित कार्य करें जिससे वायु से मुक्त होने में सहायता मिलेगी:
वायु को नियंत्रित करने के अन्य घरेलू उपाय :
वायु को घरेलू रूप से सन्तुलित करने के उपाय निम्नानुसार हैं:
वायु की समस्या से मुक्त होने के व्यायाम :
वायु का प्रभाव 40 से 45 वर्ष से अधिक आयु
वाले व्यक्तियों में अधिक होता है। ऐसे व्यक्तियों को अधिक तथा थकाने वाले कठिन
व्यायाम जैसे व्यायाम शाला (जिम) में जा कर भारी वजन उठाना, कुश्ती
लड़ना, कबड्डी खेलना, तेज़-तेज़ दौड़ना
अथवा चलना, तैरना अथवा नाचना जिनसे अधिक शारीरिक परिश्रम
वाले कार्य नहीं चाहिये जिससे अधिक स्वेद (पसीना) निकले, साँस
की लय टूटे अथवा चेहरे पर विकृति आये। इस प्रकार की गतिविधियों से शरीर में वायु
प्रकुपित हो सकती है ।
इसके विपरीत हल्के-फुल्के व्यायाम, धीरे चलना अथवा टहलना, कसरत,
योगासन, प्राणायाम करना, शाँत संगीत सुनना जिससे साँस न उखड़े बल्कि चेहरे पर प्रसन्नता और शाँति का
भाव आये, साँस आराम से तथा लयबद्ध चले, से शरीर में वायु
सन्तुलित होती है ।
पाचन दुरुस्त रखने के उपाय
जानने के लिये कृपया निम्नलिखित लिंक को क्लिक करें :
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मेहेर न्यूट्रिशन
कृपया ध्यान दें :
उपरोक्त लेख सिर्फ सूचनार्थ है और आहार सम्बन्धी है । कृपया चिकित्सा अथवा दवाई की आवश्यकता पर चिकित्सक से सम्पर्क करें ।
निवेदन :
कृपया लेख सम्बन्धी अपने विचार और सुझाव कमेंट बॉक्स में अंकित कर प्रोत्साहित करें ।
प्रियतम अवतार मेहर बाबा की जय जय जिनेंद्र सदा