आदरणीय पाठकगण
सादर नमन,
जवाहर किसान की ओर से प्रस्तुत है यह लेख आप सबके लिये। आशा है पसंद आयेगा । लेख के अंत में दिये गये कमेन्ट बॉक्स में आप अपने अमूल्य विचार व्यक्त कर सकते हैं ।
दाल का सेवन करने से पेट में वायु अथवा
गैस क्यों बनती है, ब्लोटिंग क्यों होती है ? क्या कोई तरीका है कि दाल का सेवन किया भी जाये किंतु गैस की समस्या
न हो ? किस ऋतु और किस परिस्थिति में कौन सी दाल का सेवन
करें ? दाल में कौन से पौष्टिक तत्व होते हैं और इनकी शरीर को क्या आवश्यकता होती है ?
यह सारे प्रश्न आपके भी मन में भी ज़रूर आते होंगे । आईये इस लेख
में हम आहार में आधुनिक पोषण विज्ञान तथा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से दाल के महत्व को,
तथा सेवन की विधि को जानने की कोशिश करते हैं ।
आधुनिक
पोषण विज्ञान के अनुसार दाल (प्रोटीन) की शरीर में आवश्यकता:
आधुनिक पोषण विज्ञान के अनुसार, कई अन्य
पौष्टिक तत्वों के साथ इसमें प्रोटीन भी होता है जिसके लिये दालें प्रमुखता से जानी
जाती हैं । एक ओर प्रोटीन शरीर में वृद्धि तथा विकास के लिये उत्तरदाई होता है वहीं
दूसरी ओर यह शरीर की रक्षा (ऐंटीबॉडीज़ का निर्माण) और अनुवांशिकी (डी.एन.ए. का
भाग) के लिये भी ज़िम्मेदार होती हैं । माँसपेशियों, ऊतकों, रक्त, हड्डियाँ,
ऐन्ज़ाईम (जैव उत्प्रेरक), चमड़ी, बाल और नाखून का महत्वपूर्ण भाग प्रोटीन होता है ।
यह शिशुओं, बच्चों, बच्चियों, किशोर-किशोरियों, गर्भवती माता, धात्री माता, सभी
उम्र के लोगों हेतु आवश्यक है । शाकाहार और माँसाहार दोनों में ही यह प्रचुर
मात्रा में पाया जाता है । शाकाहार में यह दूध तथा दुग्ध उत्पाद के साथ विशेषकर विभिन्न
प्रकार की दालों में प्रचुर मात्रा में उपस्थित होता है । सौ ग्राम कच्ची दाल में 19.2
ग्राम से लेकर 25.2 ग्राम मात्रा में प्रोटीन विद्यमान
होता है । एक सामान्य वयस्क व्यक्ति (पुरुष) के प्रति ग्राम शारीरिक वजन के अनुसार 1 ग्राम
प्रोटीन की आवश्यकता होती है । इसकी
आवश्यकता उम्र, लिंग और व्यवसाय के अनुसार
बदलती है ।
प्रोटीन
की गुणवत्ता:
प्रोटीन की गुणवत्ता का मूल्यांकन, उसके
पीडीकास (PDCAAS) मूल्य के आधार पर किया जाता है । अंडे का यह मूल्य 1 माना जाता है तथा अन्य सभी
स्त्रोतों से उपलब्ध प्रोटीन के मूल्य की तुलना इसी मूल्य से की जाती है ।
प्रोटीन का निर्माण अमीनो अम्ल से होता है । प्रोटीन 20 अमीनो एसिड से बना होता है जिसमें 8 आवश्यक था 2 अर्ध आवश्यक अमीनों अम्ल होते हैं, इन दसों अमीनो अम्ल की आपूर्ति आहार से ही होती है तथा इनका निर्माण शरीर में नहीं हो पाता है इसलिए इन्हें आवश्यक अमीनो अम्ल कहते हैं । अन्य दस प्रकार के अमीनो अम्ल का निर्माण शरीर कर लेता है अतः इनकी आपूर्ति आहार से करने की आवश्यकता नहीं होती ।
लिमिटिंग (सीमित) अमीनो अम्ल:
आवश्यक अमीनो अम्लों में से दाल में 9
अमीनो अम्ल होते हैं किंतु एक अमीनो अम्ल मिथियोनिन नहीं होता किंतु
लाइसिन नामक एक और अमीनो अम्ल प्रचुर मात्रा में होता है । अनाज में लाइसिन अमीनो
अम्ल नहीं होता है किंतु मिथियोनिन अमीनो अम्ल प्रचुर मात्रा में होता है ।
अतः, जब अनाज और दाल का सेवन साथ में किया
जाता है तो दसों आवश्यक अमीनो अम्ल की आपूर्ति शरीर में हो जाती है ।
दाल
के सेवन में कमी के कारण:
चूँकि आज भी भारत में दाल का उत्पादन
आवश्यकता से कम है जिस कारण यह महँगे दाम में उपलब्ध होती है,
अतः इसका सेवन निम्न मध्यम वर्ग तथा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग कम
कर पाता है । पोषण साक्षरता में कमी भी लोगों के लिये संतुलित एवं पौष्टिक भोजन के
सेवन में कमी लाती है (विशेषकर दाल के सेवन में) किन्तु यह कमी, शरीर को प्रभावित करती है ।
दाल
के सेवन में कमी का प्रभाव:
बचपन में ऊर्जा की कमी के कारण,
प्रोटीन, ऊर्जा प्रदान करने का कार्य करने
लगती है जो कि प्रोटीन का द्वितीयक कार्य है । किंतु इस कारण प्रोटीन का प्राथमिक
कार्य अर्थात शरीर का निर्माण और विकास का कार्य बाधित हो जाता है। इस वजह से दो
में से एक परिस्थिति उत्पन्न होती है - क्वाशियोरकर अथवा मरासमस, जो शारीरिक
ठिगनापन का कारण भी बन सकती है और इसका प्रभाव पूरे जीवन पर पड़ता है ।
शरीर
सौष्ठव हेतु अंकुरित मूँग का सेवन:
शरीर सौष्ठव हेतु प्रातःकाल अंकुरित मूँग
का सेवन लोगों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है, किन्तु लोग यह नहीं जानते हैं कि मूँग
की कटाई हारवैस्टर नामक यंत्र से की जाती है और हारवैस्टर के प्रयोग के पूर्व मूँग
के पौधे को सुखाने के लिये ज़हरीले रसायन का प्रयोग किया जाता है । इस प्रकार की कच्ची मूँग खाने के कारण उनके
स्वास्थ्य को नुकसान पहुँच सकता है । अतः हारवैस्टर से कटी मूँग को कच्ची अवस्था में सेवन करने से बचना
चाहिये । ध्यान दीजीयेगा कि अधिकतर कृषि रसायन, अधिक तापमान में नष्ट हो जाते हैं
। अतः कच्चे आहार के सेवन के स्थान पर पके आहार का सेवन करना अधिक लाभदायक होता है
।
दाल
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से
आयुर्वेद में दालों को शिम्बी धान्य कहा जाता
जिसका अर्थ है कि ऐसे बीज जो फलियों के भीतर पाये जाते हैं । यह शरीर में माँस
धातु तथा बल को बढ़ाने वाले माने गये हैं । कुछ अपवाद के साथ, आमतौर पर यह स्वाद
में प्रमुखत: कसैले (कषाय रस) के, तथा कुछ मधुर होते है, इनका विपाक मधुर होता है
तथा यह रुक्ष (रूखे), कफ तथा पित्त का शमन करने
वाले तथा वात की वृद्धि करने वाले होते हैं । आयुर्वेद के अनुसार दालों को वीर्य (तासीर)
के अनुसार दो भाग में विभक्त किया जाता है, ऊष्ण वीर्य (गर्म तासीर) तथा शीत वीर्य
(ठंडी तासीर) दालें ।
शीत
वीर्य (ठंडी तासीर) की दालें
निम्नलिखित
चार प्रकार की शीत वीर्य दालें (ठंडी
तासीर) की होती हैं । इनका सेवन ग्रीष्म ऋतु तथा
शरद
ऋतु में किया जा सकता है । किंतु, शीत ऋतु में इनके सेवन से बचना ठीक होगा जब मौसम
गर्म होता है :
1. मूँग दाल के गुण:
मूँग, पचने में लघु (हल्की),
रुक्ष (रूखी), बच्चों और बुजुर्गों के लिये लाभदाई होती है । अपच की स्थिति में यह किसी भी
व्यक्ति के लिये यह लाभदाई है । इसका रस (स्वाद) कषाय (कसैला) तथा मधुर (मीठा) तथा
विपाक (पचने के बाद का स्वाद अथवा रस) मधुर होता है ।
स्वास्थ्य
लाभ :
यह दाल विशेष होती है क्योंकि यह तीनों
दोष,
वात, पित्त और कफ का शमन करती है । यह लघु होती
है तथा पचने में बेहद हल्की होती है । यह ज्वर (बुखार), बीमारी के बाद की कमज़ोरी,
पाचक अग्नि मंद होने पर इसका सेवन किया जा सकता है तथा यह लाभदाई होती है । इसका
यूष (सूप) अथवा खिचड़ी सर्वोत्तम आहार माना जाता है । यह पित्त एवं रक्त शोधन में
मदद करता है, यह शरीर की अतिरिक्त गर्मी, जलन और रक्त इई अशुद्धियों को दूर करती
है जिससे त्वचा विकार और मुँहासों में आराम देता है । यह चाक्षुष्य होता है अर्थात नेत्र के लिये
हितकारी होती है । नियमित रूप से मूँग के सेवन से नेत्र ज्योति अच्छी होती है तथा
नेत्र स्वास्थ्य में सुधार होता है । यह मेदोहर होती है और वजन नियंत्रण में सहायक होती है । साथ ही
यह ग्राही होती है, तथा अतिसार (दस्त) या
आँतों की कमज़ोरी में पेट को बाँधती है और आँतों को राहत देती है ।
मूँग
दाल को पकाने की विधि:
साबुत मूँग को पकाने के पूर्व इसे पूरी
रात पानी में भिगो कर रखें फिर पानी फेंके दें अब साफ पानी से दाल को धो लें और अच्छे
से पकायें, पकाने के बाद पाचक मसाले, देसी घी, ज़ीरा, हींग, अजवाईंन, सेंधा नमक,
सोंठ / अदरक के साथ छौंक कर सेवन करें । छिल्के वाली दाल को तीन से चार घंटे
भिगोयें तथा धुली दाल को दो घंटे भिगोयें
फिर पकायें ।
2. मसूर की दाल के गुण:
शीतवीर्य (ठंडी तासीर),
लघु (पचने में हल्की और सुपाच्य) और रूक्ष (सूखी) श्रेणी में रखा
गया है । यह मधुर तथा कषाय रस (स्वाद) वाली हैं , इसका विपाक मधुर है । यह मुख्य
रूप से कफ और पित्त दोष शामक मानी जाती है, हालाँकि अत्यधिक
सेवन से वात दोष बढ़ सकता है ।
स्वास्थ्य
लाभ :
यह दाल संग्राहिक है अर्थात दस्त को रोकने
वाली दाल है । रक्तशोधक और पित्तशामक है यह शरीर की बढ़ी हुई गर्मी को शांत करती है
त्वचा विकार, मुँहासे और रक्त संबंधी अशुद्धियों को शांत करती हैं । यह ग्राही है और मल को बाँधती है, मसूर की
दाल का यूष (पतला सूप) पेट को आराम देता
है । यह वर्ण्य है तथा त्वचा की
रंगत को निखारती है । पिसी मसूर के आटे का
लेप (फेस पैक) भी लगाया जाता है जिससे त्वचा पर प्राकृतिक निखार आता है और अतिरिक्त तेल नियंत्रित होता है । यह बल्य और
पोषक है, इसमें प्रोटीन और लौह तत्व की प्रचुर मात्रा में उपस्थिति है जिसके कारण
शरीर की कमज़ोरी दूर करता है और रक्त की लाली (हीमोग्लोबिन) को बढ़ाने में मदद करता
है । मसूर का नियमित और सीमित सेवन
नेत्रों के लिये हितकर माना गया है ।
पकाने
की विधि:
मसूर की दाल को लगभग आधे घंटे से एक घंटे तक पानी में डुबा कर रखें, खड़ी काली मसूर को लगभग 4 से 6 घंटे (लगभग रात भर) डूबा कर रखें फिर पानी को फेंक दें तथा साफ पानी से धो लें तथा मूँग की दाल की तरह देसी घी तथा पाचक मसालों के साथ छौंकने के पश्चात ही सेवन करें । ऐसा करने से वात का प्रभाव कम हो जायेगा और पौष्टिक तत्वों की जैव उपलब्धता (Bio-availability) बढ़ जायेगी ।
3. अरहर की दाल के गुण:
आयुर्वेद में अरहर (तुवर) की दाल को
शीतवीर्य (ठंडी तासीर), लघु (पचने में हल्की) और
रूक्ष (सूखी) माना गया है । इसका स्वाद मधुर (मीठा) और कषाय (कसैला) होता है तथा विपाक
(पचने के बाद) मधुर रस होता है । यह मुख्य रूप से कफ और पित्त दोष को शाँत करती है,
परंतु अधिक मात्रा में सेवन से वात दोष को बढ़ाने वाली होती है ।
स्वास्थ्य
लाभ :
यह पित्त एवं रक्तशोधन करके शरीर की
अतिरिक्त गर्मी, जलन और पित्त संबंधी विकारों को शांत
करती है। यह ग्राहिणी और सुपाच्य है,
मूँग दाल के बाद इसे पचने में हल्का होता है । यह पाचन तंत्र को
संतुलित रखती है और दस्त या पेट की गड़बड़ी में राहत देती है । यह वर्ण्य
(त्वचा के लिये हितकर) है । शरीर में
विषैले पदार्थों (अम्लता / एसिडिटी) को कम करके त्वचा की चमक बनाये रखने में मदद करती है । इसमें फाईबर (रेशे) और
प्रोटीन प्रचुर मात्रा में होता है और यह कफ को शांत करती है,
जिससे यह वजन और मेद (फैट) नियंत्रित करने में सहायक है । यह पोटैशियम
और खनिज तत्वों से भरपूर होने के कारण यह हृदय स्वास्थ्य और रक्तचाप के संतुलन के
लिए अच्छी मानी जाती है ।
अरहर
की दाल पकाने की विधि:
अरहर की दाल को पकाने के पूर्व कम सेकम
आधे घंटे तक पानी में भिगो तक रखें फिर पानी को फेंक कर दाल को धोने के बाद पकायें
और मूँग की दाल की तरह ही छौंककर सेवन
करें ।
4. चना (चणक):
चने की दाल (चणक) शीतवीर्य (ठंडी तासीर),
लघु (पचने में हल्की) और रूक्ष (सूखी) होती है यह पित्त और कफ दोष
को संतुलित कराने वाली उत्तम दाल है किन्तु अधिक मात्रा में सेवन करने से अथवा बिना
तड़के के सेवन करने पर यह वात दोष को बढ़ा सकती है । इसका रस (स्वाद) कषाय (कसैला) और मधुर (मीठा) स्वाद की होती है
तथा विपाक (पचने के बाद का प्रभाव) मधुर है ।
स्वास्थ्य लाभ:
यह शरीर की अतिरिक्त गर्मी,
जलन, एसिडिटी और कफ संबंधी समस्याओं (जैसे
बलगम) को शांत करती है । यह रक्तशोधक है एवं
चने की दाल का कसैला रस और उच्च फाईबर (रेशे), रक्त में शर्करा (शुगर अथवा डायबटीज़) के स्तर को नियंत्रित करने और रक्त
को शुद्ध करने में मदद करता है। यह प्रमेहहर भी है अर्थात बार-बार मूत्र त्याग की
स्थिति से भी आराम दिलाता है ।
वर्ण्य और त्वचा के लिये हितकर है तथा
इसका बेसन (चने की दाल का आटा) चेहरे के लिये बेहतरीन उबटन और प्राकृतिक क्लींज़र का काम करता
है,
जो त्वचा के अत्यधिक तेल और मुँहासों को कम करता है । चने की दाल बल्य
और धातुवर्धक है, शरीर को ऊर्जा, ताकत और पोषण प्रदान करती है । यह मेदोहर है अर्थात पचने में हल्की और फाईबर
(रेशे) से भरपूर होने के कारण यह मेद (फैट) को कम करने और पेट को लंबे समय तक भरा
रखने में सहायक है ।
चने
की दाल पकाने की विधि:
चने की दाल को पकाने के पूर्व कम से कम 2 से 3 घंटे तक पानी में डूबा कर रखें
और गला लें फिर पानी को फेंक कर दाल को धोने के बाद पकायें और मूँग की दाल की तरह
ही छौंककर सेवन करें।
गर्म
तासीर की दालें:
निम्नलिखित दो प्रकार की दालें गर्म तासीर
की होती हैं अतः इन्हें ग्रीष्म ऋतु तथा शरद ऋतु में जब प्रकृति में पित्त
प्रकुपित होता है तब इनका सेवन नहीं करना चाहिये बल्कि इनका सेवन शीत ऋतु में
उत्तम होता है।
1. उड़द की दाल के गुण:
यह दाल उष्ण,
स्निग्ध, मधुर रस वाली होती है । इसका विपाक
(पचने के बाद स्वाद) मधुर है । पचने में गुरु (भारी) है । अत्यधिक सेवन करने से
उड़द दाल कफ और पित्त वर्धक है और यह वात शामक है करने वाली उत्तम दाल मानी जाती है
।
स्वास्थ्य
लाभ:
गरम और स्निग्ध प्रकृति के कारण, उड़द दाल
वातानाशक एवं दर्द निवारक है । यह जोड़ों के दर्द, सरवाईकिल, साईटिका, पक्षाघात (लकवा)
और नसों की कमजोरी, जैसी वात व्याधियों
में अत्यंत लाभकारी है ।
यह बल्य एवं माँसवर्धक है । शुक्रवर्धक और अत्यधिक बलवर्धक है । इस दाल का
पाचन शीत ऋतु में अच्छे से होता है अतः इसका उपयोग शीत ऋतु में करना लाभदायक होगा ।
चूँकि यह दाल वाताशामक है और जोड़ों के स्वास्थ्य के लिये लाभकारी है एवं शरीरिक
दर्द का भी निवारण करती है अतः इसका सेवन पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत किया जाता है
। पहाड़ी क्षेत्रों के अलावा अन्य क्षेत्र में भी जो लोग वात की समस्या से परेशान
हैं उनके लिये यह दाल लाभकारी होती है । शरीर का वजन बढ़ाने,
माँसपेशियों को मजबूत करने और शारीरिक दुर्बलता को दूर करने के लिये
यह दाल श्रेष्ठ मानी गई है।
चूँकि
इस दाल में फाईबर (रेशे) और स्निग्धता होती है अतः यह पुराने मलबंध (कॉन्स्टिपेशन)
दूर करने वाली (अनुलोमन) करने वाली है ।
पकाने की विधि:
उड़द दाल को भी पानी में 6 से 8 घंटे भिगो कर रखें फिर दाल पकायें इसके बाद मूँग
दाल की तरह ही देसी घी और पाचक मसालों के साथ छौंक कर तैयार करें ताकि यह आसानी से
पच सके ।
कमज़ोर
पाचन (मंदाग्नि), त्वचा रोग, यूरिक एसिड या गाऊट के रोगियों को इसका सेवन सीमित रखना चाहिये या वैद्य
की सलाह से ही करना चाहिये ।
2. कुल्थी की दाल के गुण:
आयुर्वेद में कुल्थी को एक प्रभावकारी औषधीय दाल माना जाता है । यह वात और कफ शामक और पित्त वर्धक है । इसका स्वाद (रस) कसैला है और विपाक अम्ल (खट्टा) है । यह लघु (पचने में हल्की), ऊष्ण वीर्य (गर्म तासीर), रुक्ष (रूखी) तथा इसका प्रभाव तीक्ष्ण (गहरा प्रभाव) है ।
स्वास्थ्य
लाभ:
यह अश्मरीहर (पथरी का भेदन करने वाली) है तथा किडनी (गुर्दे) की पथरी को समाप्त करने में सहायक होती है तथा पथरी को तोड़कर तथा घोलकर मूत्र मार्ग से शरीर से बाहर करती है । यह मूत्रल (Diuretic) भी है अर्थात यह मूत्र त्याग में सहायक होती है और मूत्र वर्धक होती है, मूत्र मार्ग के सूजन और जलन को कम करती है । यह मेदोहर है तथा फ्लूइड रिटेंशन को कम करता है । इन्सुलिन संवेदनशीलता को सुधारने में और डायबिटीज़ (शक्कर के नियंत्रण में) को नियंत्रित करने में लाभदायक है जिससे शारीरिक वसा और वजन को कम करने में सहायक होता है । ऊष्ण वीर्य (गर्म तासीर) की होने कारण यह दाल कास-श्वास एव प्रतिशाय है अर्थात खाँसी, ज़ुखाम, दमा, अस्थमा, श्वाँस फूलना जैसी श्वसन तंत्र संबंधी समस्याओं को ठीक करने में सहायक होता है । यह आर्तवजनक भी है अर्थात मासिक धर्म में आने वाली रुकावटों को दूर कर प्रवाह को सामान्य करने में सहायक होती है। इस हेतु कुल्थी के दाल के सूप का सेवन कर सकते हैं । मेद को कम करने में यह दाल सहायक है । साथ ही मासिक धर्म को नियमित करने में भी सहायक है । कुल्थी का उपयोग यूष (सूप) बना कर किया जा सकता है ।
कुल्थी का यूष (सूप) बनाने की विधि:
दो से तीन चम्मच कुल्थी की दाल को धोकर 6 से
8 घंटे तक पानी में भिगो कर रखें । यह पानी हटा दें और 4 से 6 गुना ताज़े पानी में धीमी
आँच अथवा कुकर में दाल के गलने और पानी की मात्रा के आधा होने तक पकायें फिर छान लें
। यूष को देशी घी, हींग, भुना हुआ ज़ीरा, सेंधा नमक और सोंठ अथवा काली मिर्च मिलाकर
हल्का गुनगुना कर सेवन करें ।
कुल्थी
के उपयोग में सावधानी:
1.
चूँकि कुल्थी ऊष्ण वीर्य (गर्म तासीर) का होता
है अतः इसका उपयोग ग्रीष्म ऋतु तथा शरद ऋतु में नहीं करना अच्छा होता है ।
2.
पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति जिन्हें बहुत
अधिक गर्मी लगती हो, हाथ-पैरों में जलन होती
हो अथवा एसिडिटी/अल्सर की समस्या हो, उन्हें कुल्थी का सेवन
कम या सावधानी से करना चाहिये ।
3.
रक्तपित्त (Bleeding
Disorders), नाक से खून बहना (नक्सीर), पाईल्स
में ब्लीडिंग या अत्यधिक मासिक धर्म (Heavy Menstruation) की
स्थिति में कुल्थी वर्जित है ।
4.
गर्भावस्था (Pregnancy)
तासीर अत्यधिक गर्म होने के कारण गर्भावस्था के दौरान इसका सेवन
नहीं करना चाहिये ।
दालों में वात कम करने की विधि
1.
सभी दालों को देसी घी अथवा तेल से छौंका
लगायें । साथ में ज़ीरा, हींग, अजवाईन, कड़ी पत्ता और अदरक का उपयोग कर सकते हैं जो
दाल को सुपाच्य बनाते हैं ।
2.
अरहर की दाल को पहले पानी छिड़क कर भून कर
रख लें ताकि दाल में उपस्थित एंटी न्यूट्रीशनल फैक्टर (विपोषक तत्व) ट्रिप्सिन
इन्हिबिटर की सक्रियता को कम किया जा सके ।
3.
दाल को खुले बर्तन में कुछ अधिक मात्रा
में पानी लेकर पकायें तथा पकाते समय पानी की सतह पर बने झाग को अलग कर लें यह एक
प्रकार की शर्करा (शक्कर) रैफिनोज़ है जिसे मनुष्य का पाचन तंत्र पचा नहीं पाता अतः
इससे पेट में गैस बनती है अथवा ब्लोटिंग होती है ।
4.
दाल को कुछ घंटों तक पीने योग्य पानी में
डूबा कर रखें जिससे दालों के बाहरी छिल्के में उपस्थित फाइटिक एसिड और टैनिन जैसे
विपोषक तत्व (एंटी-न्यूट्रिशनल फैक्टर्स), जो शरीर में आयरन (लौह
तत्व), ज़िंक, कैल्शियम और मैग्नीशियम
जैसे पोषक तत्वों के अवशोषण को रोकते हैं । दाल को पानी में डुबाने / भिगोने (Soaking)
से फाइटेज़ (Phytase) एंज़ाइम (जैव उत्प्रेरक)
सक्रिय होता है, जो फाइटिक (अम्ल) एसिड को तोड़ देता है।
दालों
में 'ऑलिगोसैकराइड्स' नाम की जटिल शर्करा (Complex
Sugars) होती है, जिसे हमारा पेट आसानी से
नहीं पचा पाता । दाल लप पानी में भिगोने से ये घुलनशील शर्करा पानी में घुल जाती
है, जिससे दाल खाने के बाद पेट में गैस, अफारा या भारीपन की समस्या नहीं होती ।
भिगोने
की प्रक्रिया से दाल में मौजूद प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्व शरीर के लिए अधिक
जैव-उपलब्ध (Bioavailable) हो जाते हैं ।
5. दाल को पकाने से पहले पानी में डुबो कर रखने और पानी को हटा देने से, फिर नये पीने योग्य पानी में इसे पकाने से समय और ईंधन की बचत होती है क्योंकि दाल के दाने नरम हो जाते हैं, जिससे दाल तेजी से पकती है और एलपीजी / ईंधन की खपत कम होती है । भीगी हुई दाल पकने के बाद एक समान और मुलायम बनती है । दाल बनाने के पहले पानी को हटा देने से दाल के विपोषक तत्व (जो दाल में प्राकृतिक रूप से उपस्थित होते हैं और जल में घुलाशील होते हैं) हट जाते हैं । अब दाल को धो कर पकायें । पानी हटाने से पानी में घुलनशील विटामिन भी अवश्य हट जायेंगे । किंतु इसकी आपूर्ति अन्य स्त्रोतों से की जा सकती है ।
ध्यान दें:
1.
शाम को दाल का सेवन कम करें क्योंकि रात
को पाचन कम हो जाता है ।
दाल की मात्रा उतनी ही लें जितना पचा सकें । साथ में ऐसा आहार कम
लें जो स्वभाव से पचने में भारी हों ।
2.
विशेषकर ग्रीष्म ऋतु तथा शरद ऋतु में में
जब जठराग्नि मंद होती है, ऊष्ण वीर्य (गर्म तासीर)
की दालों की मात्रा कम लें । इन ऋतुओं में शीत वीर्य सुपाच्य दालों (ठंडी तासीर)
का ही सेवन करें ।
3.
शीत ऋतु में ऊष्ण वीर्य (गर्म तासीर) की
दाल का सेवन अधिक करें ।
4.
दालों का सेवन दूध और दही के साथ नहीं
करें यह आपस में विरुद्ध आहार हैं ।
5.
आधुनिक पोषण विज्ञान के अनुसार प्रोटीन की
सम्पूर्णता हेतु दाल के साथ अनाज अवश्य लें ।
तिवड़ा अथवा खेसारी दाल अथवा बटरी (लाइथायरस सैटाईवस) का सेवन:
यह दाल अरहर दाल की तुलना में सस्ती होती है इसलिये व्यवसायिक तौर पर अरहर दाल के साथ इसकी मिलावट की जाती है किंतु खेसारी दाल में एक विषैला तत्व उपस्थित होता है जिसे ओ.डी.ए.पी. (ODAP) कहते हैं जो कि एक न्यूरोटोक्सिन अर्थात तंत्रिका तंत्र (नसों) को नुकसान पहुँचाने वाला तत्व है । इसके सेवन से शरीर में, विशेषकर हाथ-पाँव में दर्द होता हाई, जकड़न आ जाती है, यह तिरछे से हो जाते हैं जिसे लैथायरिज़िम कहते हैं । यह दाल हल्की पीली राग की होती हिय । यह ऊपर से तिकोनी, दूसरी ओर से चौकोर आकार और कुछ चपटी होती है जबकी अरहर की दाल पीले रंग की होती है, यह ऊपर से गोल और दूसरी ओर भी गोलाकार होती है । ध्यानपूर्वक देखने से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है ।
संदर्भ:
1. चरक संहिता
2. सुश्रुत संहिता
3. youtube/ayurvedforeveryone
4. Nutritive Value of Indian Food, National Institute of Nutrition, Hyderabad
Avatar Meher Baba Ji Ki Jai Jinendra Always !!!
Thank You for writing. Please keep in touch. Avtar Meher Baba Ki Jai Jai Jinendra Always!!!
