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शुक्रवार, 29 नवंबर 2024

शीत ऋतु में वात (गैस) की समस्या को दूर करने हेतु आहार -विहार

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वर्ष की छह ऋतुओं में से दो ऋतु, हेमंत तथा शिशिर में दो-दो माह अर्थात कुल चार माह होते हैं [अगहन माह, पौष (पूस) माह, माघ माह और फाल्गुन माह] जिनमें वातावरण का तापमान सबसे कम होता है तथा वायु रुक्ष होती है । शरीर के त्रिदोष में से वात का स्वभाव भी ठंडा और रुक्ष होता है । इन दो ऋतुओं के चार माहों में, विशेषकर 45 से 50 वर्ष की अवस्था से अधिक अवस्था के मनुष्य, वात से सर्वाधिक प्रभावित हो सकते हैं ।  हाँलाकि पूरे वर्ष में यही दो ऋतुयें सर्वाधिक स्वास्थ्यप्रद भी कहलाती हैं तथा पूर्ण रूप से स्वस्थ्य व्यक्तियों के लिये इन दो ऋतुओं में सभी छह रसों के भोज्य पदार्थों के सेवन की अनुशंसा आयुर्वेद की ओर से है । 


शरीर में तीन प्रकार के दोषवातपित्त और कफ विद्यमान होते हैं । दरअसल यह दोष नहीं बल्कि ऊर्जायें होती हैं जो शरीर तथा शरीर की क्रियाओं का संचालन करते हैं । स्वास्थ्य हेतु यह आवश्यक है कि इन तीनों ऊर्जाओं को शरीर में संतुलित रखा जाये । त्रिदोष, शरीर को स्वस्थ्य रखने हेतु, विभिन्न शारीरिक गतिविधियाँ संचालित करते हैं । इनमें से एक, वात दोष, वायु तथा आकाश तत्व से निर्मित होता है । यह दोष शरीर के अंगों की विभिन्न गतिविधियों तथा रक्त प्रवाह इत्यादि को संचालित करता है तथा शारिरिक क्रियाओं को गति प्रदान करता है । किन्तु, शरीर में वात की वृद्धि (प्रकुपित होना) अथवा असंतुलित होने से वायु सम्बंधी समस्या हो सकती है जिसे आयुर्वेद में वात अथवा आम भाषा में बादी की समस्या कही जाती है । 


इन शारीरिक ऊर्जाओं को संतुलन में रखने हेतु बुद्धिमत्तापूर्वक आहार का सेवन करना चाहियेकिंतु इस प्रकार के आहारीय प्रबंधन करने के लियेआयुर्वेद तथा आहार विज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक हैइस उद्देश्य  हेतुयह लेख  आपके समक्ष सादर प्रस्तुत है ।


शरीर में असंतुलित वात से सम्बन्धित समस्यायें :

शरीर में वात के प्रभाव के कारण निम्नलिखित समस्यायें हो सकती हैं :  

  1. शरीर के जोड़ोंकमर और हड्डियों में दर्द होना।
  2. घबराहट होना ।
  3. पेट में गैस बनना, पेट फूलना, बार-बार डकार आना, शरीर से बदबूदार गैस निकलना ।
  4.  मल कड़ा तथा काले रंग का होना, मल त्याग में समस्या होना (कब्ज़ अथवा कॉन्स्टिपेशन होना), तथा बवासीर होना ।
  5. चक्कर आना, बी.पी. की शिकायत होना ।
  6. साँस की समस्या होना खाँसी होना ।
  7. वायु की कमी से शरीर में आलस्य होना ।
  8. वायु, स्नायु तंत्र (नरवस सिस्टम) से सम्बन्धित होता है । बहुत अधिक उलझे हुये स्वप्न आना और नींद हल्की हो जाना ।
  9. श्वसन सम्बन्धी तथा सायनस सम्बन्धी समस्या होना ।  
  10. मन में लगातार उलझन होना  अथवा मन उद्वेलित रहनामन में चंचलता होना आथवा मन अशाँत होना और भागना, मन एकाग्रचित्त न हो पाना ।
  11. मति भ्रम होना । मन में अति व्यग्रता (ऐंक्ज़ायटी) होना बहुत अधिक चंचलता होना (हाईपर ऐक्टिव) ।

 

वातज व्यक्तियों की पहचान:

वातज व्यक्तियों की पहचान उनके शारीरिक लक्षणों को देखकर की जा सकती है, जो कि इस प्रकार हैं : 

  1. त्वचा का रंग समान्य से अधिक साँवला होना।
  2. शरीर में और त्वचा पर रूखापन होना । आँखोँ, होठों और हथेली पर रूखापन होना और जीभ में दरारें सी होना।
  3. वास्तविक उम्र से अधिक उम्र दिखना ।
  4. हड्डियों से कट-कट की आवाज़ होना ।
  5. दुबला पतला शरीर होना, शरीर में हड्डियाँ दिखना, शरीर की ऊँचाई सामान्य से अधिक अथवा कम होना ।

 

ऋतु, समय, अवस्था तथा शरीर के भाग के अनुसार वात का प्रभाव:

ऋतु, समय, अवस्था तथा शरीर के भाग के अनुसार वात का प्रभाव इस प्रकार है :

  1. र्षा ऋतु में वात प्रकुपित होता हैग्रीष्म ऋतु में यह संचित होता है और शरद ऋतु में इसका शमन होता है ।
  2. प्रतिदिनप्रात: तथा अपरान्ह (दोपहर) 2 से 6 के मध्य वात प्रभावी होता है ।
  3. ज़्यादातर ४५ से ५० वर्ष की उम्र से अधिक के व्यक्तियों पर वात का प्रभाव अधिक होता देखा गया है ।
  4. वात का प्रभाव जोड़ों पर अथवा कमर के नीचे अंगों पर अधिक देखने को मिलता है ।


वात की सर्वोत्तम औषधि:

वात की सर्वोत्तम औषधियाँ इस प्रकार हैं : 

  1. आहार में तेल, तिलहन और स्निग्ध आहार का उपयोग ।
  2. गर्म तासीर और गर्म तापमान का आहार एवं गर्म अथवा गुनगुने तापमान के पेय जल का सेवन ।
  3. गुनगुने तापमान के तेल की मालिश ।
  4. ठंडी तासीर और तापमान के और रूखे आहार के सेवन से बचना ।  
  5. एक चम्मच मेथी के धुले दानों को रात भर एक कटोरी स्वच्छ पेय जल में डुबा कर ढक कर रखना तथा अगली सुबह जल ग्रहण करना तथा बीज को चबा-चबा कर सेवन करना । ध्यान रखें जिन व्यक्तियों को पथरी की शिकायत हो वे इस उपाय को न अपनायें।    
  6. हरिश्रंगार (पारिजात अथवा सिहरुआ) के पत्तियों का सेवन करना जिससे वात को नियंत्रित किया जा सकता है । हरिश्रिंगार का काढ़ा बनाने और सेवन की विधि का लिंक नीचे दिया गया है । इसे जानने के लिये निम्नलिखित लिंक को कृपया क्लिक करें : कृपया इस लिंक को क्लिक करें ।

 

आहारीय रसों (स्वाद) एवं अभ्यंग (तेल मालिश) तथा अन्य उपायों से वायु दोष के संतुलन के उपाय :

आहार में छह प्रकार के रस होते हैं ।  इन छह रसों का युक्तिपूर्वक उपयोग कर के वायु को नियंत्रण किया जा सकता है

  1. तीखे (मिर्चअदरकअधिक मसालेदार आहार इत्यादि)कसैले (आँवलाकच्चा अमरूदपालकमसूर सहित सभी दालें आदि) तथा कड़वे (करेला और नीम आदि) रस (स्वाद) की खाद्य सामग्री शरीर में वायु की वृद्धि कर सकता है इसलिये यदि शरीर में वायु बढ़ी हुई हो तो उपरोक्त रसों का  सेवन  नहीं करें ।  
  2. मीठे, खट्टे और नमकीन रस के आहार के सेवन से वायु का शमन (कम करना) होता है इसलिये यदि शरीर में वायु बढ़ी हुई हो तो उपरोक्त रसों के आहार का सेवन करना लाभकारी हो सकता है  ।   
  3.  ठंडी तासीर का तथा रुक्ष (रूखा) आहार (ऐसा आहार जिसमें चिकनाई अथवा स्निगधता कम हो) शरीर में वायु की वृद्धि करता है अतः उपरोक्त प्रकार के आहार का सेवन नहीं करना चाहिये  बल्कि, गर्म तासीर का आहार, तथा स्निग्ध (चिकनाईयुक्त) आहार का सेवन करना चाहिये जिससे शरीर में वात संतुलित होता है ।
  4. गरिष्ठ भोजन, घर की रसोई के बाहर बना भोजनबासी अथवा लम्बे समय से रखा हुआ  भोजन ठंडे अथवा फ्रिज में रखे  भोजन का सेवन नहीं करें ।
  5. खाने को अच्छी प्रकार चबा-चबा कर खायें और भूखे पेट नहीं रहें  ।
  6. शरीर में तिल अथवा सरसों के तेल से मालिश करने से वात संतुलित होता है । नाभि में तेल लगायें तत्पश्चात धूप तापें,  फिर गुनगुने तथा स्वच्छ जल से स्नान करें । नाक के दोनों छिद्रों में तेल लगायें इससे भी शरीर में वात दोष नियंत्रित होता है ।
  7. पैरों के तलवे की, तिल अथवा सरसों के तेल से मालिश करने से भी शरीर की वायु सन्तुलित होती है तथा अच्छी नींद आती है ।
  8. समय पर सोना तथा पर्याप्त मात्रा में नींद लेना तथा समय पर जागना, नियमित रूप से ध्यान –पूजन करना शरीर में वात को नियंत्रित करने में सहायता करता है ।  
  9. तनाव, क्रोध, लालच, और अधिक महत्वाकांक्षा न करना भी वात दोष को नियंत्रित रखने में सहायक होता है ।
  10. श्वास तथा मन को नियंत्रित रखना, एकाग्रचित्त तथा प्रसन्नचित्त रहना भी वात दोष को नियंत्रित रखने में सहयोग करता है  ।
 

      स्वर अथवा नाड़ी विज्ञान एवं वात नियंत्रण:

      स्वर अथवा नाड़ी विज्ञान एवं वात नियंत्रण का उपाय इस प्रकार है : 

  1. नासिका के दो छिद्रों में से स्वयं की दाहिना छिद्र सूर्य नाड़ी होती है जिसे पिंगला नाड़ी तथा बायाँ छिद्र चन्द्र नाड़ी अथवा इड़ा नाड़ी होती है तथा इन दो नाडियों के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी स्थित होती है ।
  2. जब सूर्य स्वर चलता है तब ठोस आहार का सेवन करने की अनुशंसा है तथा जब चन्द्र स्वर चल रहा हो तब तरल आहार के सेवन की अनुशंसा है । यदि इस नियम का पालन किया जाये तो शरीर के द्वारा आहार पूर्ण रूप से ग्राह्य होगा तथा पचेगा एवं आम (विष अथवा टॉक्सिन) कम से कम बनेगा । इस तरह से शरीर में वात दोष कम सक्रिय होगा ।
  3. नासिका के छिद्रों के नीचे हाथ की अँगुली ले जा कर स्वर के चालन को सरलता से अनुभव किया जा सकता है  
 
आधुनिक पोषण विज्ञान के अनुसार वायु दोष (गैस्ट्रिक ट्रबल) का संतुलन प्राप्त करने के उपाय  :
        आधुनिक पोषण विज्ञान के अनुसार आहर में पाँच प्रमुख पोषक तत्व होते हैं तथा दो अन्य पोषक तत्व विद्यमान होते हैं । यदि इन पोषक़ तत्वों का सेवन युक्तिपूर्वक किया जाये तो भी वायु को संतुलित अवस्था में रखा जा सकता है । यह उपाय निम्नानुसार हैं :
  1. रेशेदार भोजन का सेवन करें अर्थात जिस भी फल अथवा सब्ज़ी को छिल्के सहित खाया जा सके उनका सेवन छिल्के सहित ही करें ।
  2. गेहूँ तथा अन्य अनाज को दरदरा पिसवायें तथा इनका सेवन, चोकर सहित करें ।
  3. मैदे से बने व्यंजन का सेवन नहीं करें ।
  4. स्टार्चयुक्त (माड़ युक्त) आहार का सेवन नहीं करें अथवा स्टार्च को हटा कर करें । स्टार्चयुक्त भोज्य पदार्थ जैसे : आलू, चावल, शकरकन्द और साबूदाना ।
  5. बिना पॉलिश (अथवा कम पॉलिश की हुई) किये हुये चावल का सेवन करें ।
  6. बिना पॉलिश (अथवा कम पॉलिश की हुई) की हुये दाल का सेवन करें ।
  7. अधिक प्रोटीन युक्त, शाकाहार तथा माँसाहार और अंडे जो पचाने में दुष्क़र हों, का सेवन नहीं करें, विशेषकर शाम को ऐसा भोजन करें जिसमें ऐसी प्रोटीन का सेवन करें जो सुपाच्य हो जैसे मूँग की दाल  
  8. विटामिन-बी कॉम्प्लैक्स से युक्त आहार अथवा विटामिन-बी कॉम्प्लैक्स के पूरक आहार (विटामिन-बी सप्लिमैंट) का सेवन करें ।
  9. वात के प्रभाव को कम करने के लिए कैल्शियम, विटामिन-डी और पोटैशियम से युक्त भोज्य पदार्थों का सेवन किया जा सकता है ।  विटामिन-डी के लिये अभ्यंग (तेल की मालिश) कर धूप सेंकें जिससे शरीर में विटामिन-डी का निर्माण होगा ।  


वायु प्रबन्धन हेतु आहार :

आहार, शरीर के दोषों में वृद्धि अथवा शमन करते हैं । आहार का युक्तिपूर्वक सेवन कर दोषों को संतुलित कर अच्छे स्वास्थ्य को प्राप्त किया जा सकता है । इसी प्रकार कुछ विशिष्ट प्रकार के आहार के युक्तिपूर्वक सेवन करने अथवा कुछ अन्य प्रकार के आहार के सेवन नहीं करने से शरीर में वात दोष को संतुलित किया जा सकता है जैसे यदि शरीर में वात प्रकुपित हो तो वात की वृद्धि करने वाले आहार का सेवन नहीं करना चाहिये तथा वात का शमन करने वाले आहार का सेवन करना चाहिये । यह विशिष्ट प्रकार के आहार इस प्रकार हैं :

 

वात की वृद्धि करने वाले फल :

सेब, आग में पकाया हुआ सेब, केला, ब्लैकबेरी, सूखे फल, गूज़बैरी, लीची, अनार, सातसुमा, रभर्ब, रैस्पबैरी, कच्चा केला, आँवला और कच्चा टमाटर ।

 वात का शमन (कम) करने वाले फल :

एवोकैडो, चैरी, अँगूर, कीवी, मैलन (तरबूज़ अथवा खरबूज़), संतरा, पॉपॉपीच (आड़ू), अनानास, प्लम (आलूबुखारा),  करौन्दा, पपीता और आग में पकाया हुआ टमाटर इत्यादि ।

 फल, जो न वात में वृद्धि करें और न ही शमन करे :  

एप्रीकॉट (खुबानी), ग्रेपफ्रूट (चकोतरा), नींबू, लाईम, आम, पियर (नाशपाती) और स्ट्रॉबैरी ।

 

वात की वृद्धि करने वाली सब्ज़ियाँ :

बैंगन, बीन्स (फलियाँ), ब्रॉकली (हरी गोभी), पत्ता गोभी, फूलगोभी, मशरूम, प्याज़, पार्सले (अजमोद), मटर, मिर्च, आलू, पालक, स्वीट कॉर्न, मूली, शलजम, कुन्दरू, परवल और करेला ।

 वात का शमन करने वाली सब्ज़ियाँ  :

आर्टिचोक (हाथीचक), एस्पैरेगस (शतावरी), चुकन्दर, गाज़र, ककड़ी, खीरा, अदरक, लीक (हरा प्याज़), भिंडी, पार्नसिप, स्वीड् (स्वीडन से आया एक प्रकार का शलजम), वॉटरक्रैस (जलकुंभी) इत्यादि ।

 सब्ज़ियाँ, जो न वात की वृद्धि करें और न ही शमन करे :  

कूरगैट (ज़ुकनी अथवा लंबा पीला कद्दू) ।

 

वात का शमन करने वाले मेवे एवं बीज:

शरीर में वात दोष की वृद्धि करने वाले तथा न वात दोष की वृद्धि और न ही वात दोष का शमन करने वाले मेवे तथा बीज आमतौर पर न के बराबर ही उपलब्ध होते हैं अत: इनका उल्लेख इस स्थान में नहीं किया जा रहा है ।

वात दोष का शमन करने वाले मेवे तथा बीज इस प्रकार हैं: बादाम, ब्राज़ील नट (ब्राज़ील देश में उत्पादित होने वाला मेवा), काजू, नारियल, चिरौंजी, हेज़ल नट (कॉब नट और फिल्बर्ट के नाम से भी जाना जाता है),  मुँहफली, कुम्ड़ाह  (कद्दू) का बीज, तिल का बीज, सूर्यमुखी का बीज एवं अखरोट ।

 

अनाज, दलहन एवं तिलहन जो वात की वृद्धि करते हैं :

बीन्स (फलियाँ),बक व्हीट (एक प्रकार का अनाज), दालें, मक्का, राई और सोयाबीन । 

 अनाज, दलहन एवं तिलहन जो वात का शमन करते हैं :

            ब्राऊन ब्रैड, जई, पास्ता, बासमती चावल, ब्राऊन राईस (भूरा चावल), व्हाईट राईस (सफेद चावल) और पीला चावल ।

 अनाज, दलहन एवं तिलहन जो न वात की वृद्धि करते हैं न शमन करते हैं :

जौ ।

 

वायु तथा मोटा अनाज, अनाज, एवं तिलहन (मुँहफली) के उपयोग की विधि :

  1. मोटा अनाज जैसे कोदो, कुटकी, साँवा और रागी इत्यादि स्वभाव में रुक्ष होने के कारण वात को बढ़ाने वाले होते हैं अतः इनका सेवन घी अथवा तेल के साथ ही करना चाहिये ।
  2. अनाज जैसे चावल में स्टार्च (माड़) होता है जिस कारण यह मल को सूखा कर देता है । अतः चावल को कमसेकम एक वर्ष पुराना ही सेवन करें  जिससे स्टार्च, सरल शर्करा (Sugar Molecule) में परिवर्तित हो जाता है जिससे चावल सुपाच्य हो जाता है। 
  3. यदि चावल नया ही बनाना हो तो चावल को हल्का भून लें ऐसा करने से भी चावल अधिक सुपाच्य हो जाता है । इसी तरह अन्य अनाज को भी कम से कम एक वर्ष पुराना ही खाना चाहिये । शाली चावल (साथ दिन में पकने वाला चावल उत्तम माना गया है ) गेहूँ स्निग्ध और स्वाद में मीठा होता है अतः  यह वात को संतुलित करता है ।
  4. चावल को खुले बर्तन में अधिक पानी के साथ बनायें और अतिरिक्त पानी को हटा दें जिससे स्टार्च हट जायेगा। इसी प्रकार पोहा, साबूदाना और आलू को भी अतिरिक्त पानी हटा कर बनायें को जिससे स्टार्च हट जायेगा।
  5. चावल पकाते समय थोड़ी मात्रा में देसी गाय के दूध से बना घी डालें, इससे चावल में चिपचिपापन खत्म हो जायेगा और चावल खिला-खिला बनेगा क्योंकि स्टार्च के कारण दानों के बीच विद्यमान चिपचिपापन, खत्म हो जायेगा । ऐसे चावल चावल के सेवन से जिसमें स्टार्च (माड़) का प्रभाव  खत्म हो गया हो, के सेवन से शरीर में वायु प्रकुपन कम होगा ।
  6. गेहूँ भी कम से कम एक वर्ष पुराना ही सेवन करें ।
  7. मुँहफली भी वात में वृद्धि करती है अतः इसका सेवन उबालकर, भूनकर तल कर करना चाहिये । ध्यान रखें कि मुँहफली का सेवन अधिक मात्रा में नहीं करें ।

 

वायु तथा दाल के उपयोग की विधि :

लगभग सभी प्रकार की दालें स्वाद में कसैली तथा रुक्ष होती हैं एवं शरीर में वायु की वृद्धि करने वाली होती हैं अतः सभी दालों को घी अथवा तेल और हींग से छौंका लगा कर अथवा बघार कर सेवन करना चाहिये । गरिष्ठ अथवा भारी दालें हैं मसूरउड़दराजमामटरतिवड़ासोयाबीनलोबिया (चवली की दाल)  चना और छोला । मूँग की दाल कम गरिष्ठ होती हैं अतः इसका सेवन किया जा सकता हाँलाकि यह भी हल्का वात को बढ़ाता है । अतः मूँग के अतिरिक्त दाल का सेवन ध्यानपूर्वक तथा सीमित मात्रा में करें । अरहर दाल पर स्वच्छ पेय जल की कुछ मात्रा को छिड़ककर कुछ नम करें । नम दाल को हल्का भून कर और खुले बर्तन में पका कर तथा फेन को हटाने के बाद, घी अथवा तेल और हींग से छौंका लगा कर अथवा बघार कर सेवन करना चाहिये । दाल के उपयोग की विधि जानने के लिये कृपया निम्नलिखित लिंक को क्लिक करें :

लिंक :

 

वात की वृद्धि करने वाली मसाले :

इलायची, दालचीनी, लौंग और पुदीना ।

वात का शमन करने वाले मसाले :

जावित्री (जायफल), इलायची, बड़ी इलायची, काली मिर्च, मिर्च, धनिया, ज़ीरा, सौंफ, अदरक, लहसुन, केसर और ह्ल्दी ।


वात का शमन करने वाले मीठे :

शक्कर एवं भूरी शक्कर (शुगर ब्राऊन), गुड़, खांड अथवा देशी मिश्री ।

ऐसा मीठा जो न तो वात की वृद्धि करता है और न ही शमन करता है :

शहद न तो वात की वृद्धि करती है और न ही शमन करती है ।

 

वात का शमन करने वाले तेल:

नारियल का तेल, जैतून का तेल, तिल का तेल, सूर्यमुखी (सूरजमुखी) का तेल, मक्के का तेल, कुसुम (सैफ्फ्लॉवर) का तेल, चिरौंजी का तेल, वनस्पति तेल, अखरोट का तेल और सरसों का तेल । 

 

वात की वृद्धि करने वाले दुग्ध तथा दुग्ध उत्पाद:

बकरी का दूध कुछ लोगों में वात की वृद्धि करता है क्योंकि बकरी के दूध का स्वाद हल्का सा कसैला होता है । 

वात का शमन करने वाले दुग्ध तथा दुग्ध उत्पाद:

मक्खन, कड़ा चीज़ (हार्ड चीज़), मुलायम चीज़ (सॉफ्ट चीज़), नीला चीज़ (ब्ल्यू चीज़,) गाय का दूध, अंडे का सफेद भाग, मार्जरीन, मेयोनेज़ दही (योगर्ट) । गाय का दूध, दही, पनीर, भैंस का दूध और भैंस के दूध से निर्मित घी । 

दुग्ध तथा दुग्ध उत्पाद, जो न वात में वृद्धि करें और न ही शमन करे:  

कंडैंस्ड दूध (गाढ़ा दूध जिसमें पानी की मात्रा को कम कर दिया गया हो), घी, बकरी का दूध, आईसक्रीम, कम मलाई का स्प्रैड (मक्खन), सोयाबीन का दूध और अंडे का पीला भाग ।

 

वात की वृद्धि करने वाले अन्य पेय पदार्थ :

सेब का रस, कोला, नींबू का शर्बत, कॉफी और चाय (चाय के सेवन से जठराग्नि मंद हो जाती है जिससे आहार का पाचन पूरी तरह से नहीं हो पाता है) अतः धीरे-धीरे चाय के सेवन को रोक देना अच्छा होता है । 

वात का शमन करने वाले अन्य पेय पदार्थ:

संतरे का रस, गर्म तरल चॉकलेट, मॉल्ट (सत्तू ) का पेय पदार्थ और मिनरल वॉटर (खनिज युक्त बोतलबन्द स्वच्छ पेय जल) ।

 

वायु प्रबन्धन हेतु आहार लेने का उचित समय :

यदि आहार सही समय लिया जाये तो पाचन कार्य सुचारु रूप से होगा जिससे वायु कम बनेगी । आहार लेने का उचित समय इस प्रकार है :

  1. सुबह का भोजन दिन भर का मुख्य आहार होना चाहिये जो लगभग 10 बजे के आस-पास ग्रहण करना चाहियेक्योंकि सुबह 10.00 बजे से दोपहर 2.00 बजे तक शरीर में पित्त दोष सक्रिय (Bile Acid) होता है जो कि पाचन के लिये आवश्यक होता है । सुबह 10.00 बजे भोजन करने से दोपहर 2.00 तक आहार का पाचन पूर्ण रूप से हो जाता है ।
  2. शाम का भोजन हल्का होना चाहियेजिसे  शाम को 4.00 बजे तक कर लेना चाहिये ताकि सूर्यास्त होने के पूर्व आहार का पाचन हो जाये क्योंकि सूर्यास्त होने के उपरांत जठराग्नि (Metabolic fire or Digestive fire) मंद हो जाती है जिससे आहार पूरी तरह से पच नहीं पाता है जिसके फलस्वरूप  शरीर में वायु प्रकुपित हो सकती है । 


वायु प्रबन्धन हेतु पारम्परिक आहारीय ज्ञान :

चूँकि इस लेख में हेमंत एवं शिशिर ऋतु में होने वाली वात की समस्या के उपायों के बारे में विचार हो रहा है अतः शीत ऋतु के दो माहों अगहन एवं पौष (पूस) की परमपरागत् अनुशंसा इस प्रकार है: 


हेमंत ऋतु के अगहन माह की पारंपरिक एवं अनुभवजन्य आहारीय परामर्श :

हेमंत ऋतु के प्रथममाहअगहन में तेल तथा तिलहन का उपयोग अधिक करना चाहिये स्निग्ध आहार का सेवन लाभकारी होता है जैसे मुँगफलीतिलअलसीसोयाबीनसूरजमुखीजैतून इत्यादि तथा इनके तेल में तले हुये व्यंजनों का सेवन करें । साथ ही ध्यान रखें कि अगहन माह में ज़ीरे का सेवन नहीं करें क्योंकि ज़ीरा रुक्ष अर्थात रूखा होता है ।

हेमंत ऋतु के (पूस) माह में पारंपरिक एवं अनुभवजन्य आहारीय परामर्श :

हेमंत ऋतु का द्वितीय माह पौष (पूस) होता है. यह माह अगहन माह की तुलना में अधिक ठंडा होता है. इस मास में भीअगहन माह की ही तरह ही स्निग्ध आहार के अतिरिक्त दूध के सेवन की अनुशंसा है किंतु ध्यान रखें कि इस माह में धने (धनिया मसाले) का सेवन नहीं करें। 

 

शिशिर ऋतु के माघ मास हेतु पारम्परिक एवं अनुभवजन्य आहारीय अनुशंसा :

अनुभवजन्य एवं परम्परिक ज्ञान के अनुसार शिशिर  ऋतु के माघ माह में घी और खिचड़ी के सेवन की अनुशंसा है किंतु इस माह में मसूर से बने व्यंजनों तथा खाद्य उत्पादों के सेवन का निषेध है । 

शिशिर ऋतु के फाल्गुन मास हेतु पारम्परिक एवं अनुभवजन्य आहारीय अनुशंसा :

अनुभवजन्य एवं परम्परिक ज्ञान के अनुसार शिशिर  ऋतु के फाल्गुन माह में प्रातः काल उठ कर स्नान करने की अनुशंसा है किंतु इस माह में चनेबेसन तथा इनसे बनने वाले व्यंजनोंखाद्य उत्पादों (नमकीनपकौड़ा और ब्रैड पकौड़ा इत्यादि) के सेवन का निषेध है ।

 

आधुनिक पोषण विज्ञान द्वारा वायु प्रबन्धन के उपाय :

आधुनिक पोषण विज्ञान का उपयोग कर भी वात की समस्या का प्रबंधन किया जा सकता है । यह उपाय निम्नानुसार हो सकते हैं :

पाचन दुरुस्त नहीं होने की पहचान :

यदि मुँह में छाले हो जाते हैं तो यह समझें कि पाचन दुरुस्त नहीं है और पाचन को दुरुस्त करने के लिये हल्का, सुपाच्य आहार (आसानी से पच सकने वाले आहार जैसे छिल्के वाली मूँग की दाल और चावल की खिचड़ी का सेवन करें तथा विटामिन-बी की पूरक गोलियों (सप्लीमैंट) का सेवन किया जा सकता है ।

पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने के लिये आँतों में स्थित, मित्र सूक्ष्मजीव सहायक होते हैं । मित्र सूक्ष्मजीव को सुचारू रूप से कार्य करने के लिये विटामिन-बी सहायता करती है ।  वायु की समस्या पाचन के दुरुस्त नहीं होने के कारण भी हो सकती है । अतः, पाचन को दुरुस्त कर वायु की समस्या (गैस्ट्रिक समस्या) का समाधान करने के लिये विटामिन-बी के खाद्य स्त्रोत अथवा विटामिन -बी की पूरक गोलियों (जैविक अथवा रासायनिक गोलियाँ) का सेवन भी लाभकारी सिद्ध हो सकता है । पूरक गोलीयों को सप्लीमैंट भी कहा जाता है । 

 

वायु तथा स्टार्चयुक्त आहार : 

स्टार्चयुक्त आहार के सेवन से वायु की समस्या में वृद्धि हो सकती है । इस समस्या का हल आहार से स्टार्च को हटा देने में है । स्टार्चयुक आहार हैं आलू, चावल, साबूदाना और कच्चा केला इत्यादि । यदि शरीर में वात दोष प्रकुपित हो तो इन भोज्य पदार्थ का सेवन नहीं करें  ।

 

आहार लेने के बाद वायु से मुक्ति के उपाय :

आहार लेने के बाद निम्नलिखित कार्य करें जिससे वायु से मुक्त होने में सहायता मिलेगी: 

  1. सौ कदम आराम से टहलें ।
  2.  कुछ देर पवन मुक्तासन (पैर पीछे कर के घुटने के बल इस प्रकार बैठना कि पीठ एकदम सीधी रहे)।
  3. बायें करवट ले कर कुछ देर लेटना। बायें ओर ही हमारा जठर होता है जहाँ आहार के पाचन का कार्य सम्पन्न होता है ।


वायु को नियंत्रित करने के अन्य घरेलू उपाय :

वायु को घरेलू रूप से सन्तुलित करने के उपाय निम्नानुसार हैं:

  1.  दाल को बघारने अथवा छौंका लगाने के लिये के लिये हींग का उपयोग किया जा सकता है ।
  2. कुम्ड़ाह बनाते समय मेथी के दाने का उपयोग वायु को संतुलित करने के लिये लाभकारी होता है क्योंकि मेथी का दाना कैल्शियम का बहुत अच्छा स्त्रोत होता है जो पाचन में सहयोग प्रदान करता है ।
  3. यदि गैस बने और पेट फूले तो अजवाईन को आँच पर गर्म करें, इसमें थोड़ी सी मात्रा में  हींग और काले नमक मिश्रित करें । इस मिश्रण का थोड़ी सी मात्रा में सेवन करें तथा ऊपर से गुनगुने पानी का सेवन कर लें  अथवा आधे कटे नींबू पर सेन्धा नमक छिड़ककर आँच पर गर्म कर लेने के उपरांत नींबू के रस को चूस लें ।
  4.  पेट को पूरी तरह से साफ रखने के लिये मैदे से बने आहार का सेवन नहीं करना बल्कि चीत्तीदार केले और पूरी तरह से पके पपीते का सेवन करना, रात को सोने से पहले आधे गिलास गुनगुने पानी में  एक चम्मच ईसबगोल की भूसी मिश्रित कर के सेवन करना लाभकारी होता है जिससे कब्ज़ होने की संभावना कम होती है  जिससे वायु का प्रकुपन भी कम होगा। छिल्के सहित खाये जाने वाले फल एवं सब्ज़ियों का सेवन करना तथा आटे को चोकर सहित सेवन करना भी  पेट साफ रखने में सहायक होता है ।
  5. शिशुओं का पेट फूले तो नाभी में हींग का पानी लगाने से लाभ मिलता है तथा शरीर में फँसी वायु डकार द्वारा शरीर से बाहर आ जाती है ।
  6. इस समस्या  से राहत अक्युप्रेशर अथवा सुजोक थैरिपी से भी मिलती है । सुजोक थैरिपी कोरिया देश की एक ठैरिपी है जिसमें हाथ, पैर और शरीर के कुछ विशेष बिन्दुओं को दबा कर अथवा बीज लगा कर अथवा छोटे आकार एक चुम्बक लगा कर उपचार किया जा सकता है । इस उपचार को सीखने के लिये यू-ट्यूब चैनल पर विशेषज्ञों के विषय सम्बन्धी विडियो देखे जा सकते हैं ।  

 

वायु की समस्या से मुक्त होने के व्यायाम :

वायु का प्रभाव 40 से 45 वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्तियों में अधिक होता है। ऐसे व्यक्तियों को अधिक तथा थकाने वाले कठिन व्यायाम जैसे व्यायाम शाला (जिम) में जा कर भारी वजन उठाना, कुश्ती लड़ना, कबड्डी खेलना, तेज़-तेज़ दौड़ना अथवा चलना, तैरना अथवा नाचना जिनसे अधिक शारीरिक परिश्रम वाले कार्य नहीं चाहिये जिससे अधिक स्वेद (पसीना) निकले, साँस की लय टूटे अथवा चेहरे पर विकृति आये। इस प्रकार की गतिविधियों से शरीर में वायु प्रकुपित हो सकती है ।

इसके विपरीत हल्के-फुल्के व्यायाम, धीरे चलना अथवा टहलना, कसरत, योगासन, प्राणायाम करना, शाँत संगीत सुनना जिससे साँस न उखड़े बल्कि चेहरे पर प्रसन्नता और शाँति का भाव आये, साँस आराम से तथा लयबद्ध चले, से शरीर में वायु सन्तुलित होती है ।

पाचन दुरुस्त रखने के उपाय जानने के लिये कृपया निम्नलिखित लिंक को क्लिक करें :

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मेहेर न्यूट्रिशन

 

कृपया ध्यान दें :

उपरोक्त लेख सिर्फ सूचनार्थ है और आहार सम्बन्धी है । कृपया चिकित्सा अथवा दवाई की आवश्यकता पर चिकित्सक से सम्पर्क करें ।

निवेदन :

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प्रियतम अवतार मेहर बाबा की जय जय जिनेंद्र सदा

 

 

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2024

वात का प्रभाव एवं आहार-विहार से नियंत्रण

शरीर में तीन प्रकार के दोष, वात, पित्त और कफ होते हैं । दरअसल यह दोष नहीं बल्कि ऊर्जायें होती हैं जो शरीर तथा शरीर की क्रियाओं का संचालन करते हैं। 


स्वास्थ्य हेतु यह आवश्यक है कि इन तीनों ऊर्जाओं को संतुलित रखा जाये । इन शारीरिक ऊर्जाओं को संतुलन में रखने हेतु बुद्धिमत्तापूर्वक आहार का सेवन करना चाहिये, किंतु इस प्रकार के आहारीय प्रबंधन करने के लिये, आहार विज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक है, इस हेतु ही, तीन दोषों में से एक, वात संतुलन हेतु आहार विहार प्रबंधन विषयक लेख  आपके समक्ष प्रस्तुत है ।


शरीर में वात के प्रभाव :

नीचे दिये गये कारणों से शरीर में वात असंतुलित हो सकता है अत: इनसे बचना लाभकारी होगा:  

1. यदि शरीर में, जोड़ों, कमर में और हड्डियों में दर्द महसूस करते हैं तो सम्भावना है कि ऐसा मनुष्य वात से प्रभावित हो ।

2. यदि पेट में गैस बन रही हो अथवा डकार आ रही हो तो सम्भावना है कि शरीर में वात का प्रभाव हो ।

3. बहुत अधिक उलझे हुये स्वप्न आना और नींद हल्की हो जाना ।

4. मन में लगातार उलझन होना  अथवा मन उद्वेलित रहना, मन में चंचलता होना आथवा मन अशाँत होना ।


वात का प्रभाव:

1.  वात का प्रभाव  पूरे शरीर में दर्द के रूप में हो सकता है किंतु इसका प्रभाव कमर के नीचे के अंगो में अर्थात पैरों में अधिक होता है ।

2. वर्षा ऋतु में वात प्रकुपित होता है, ग्रीष्म ऋतु में यह संचित होता है और शरद ऋतु में इसका शमन होता है ।

3.प्रतिदिन, वात, प्रात: तथा अपरान्ह (दोपहर) 2 से 6 मध्य वात प्रभावी होता है।


वात की सर्वोत्तम औषधि:

1.आहार में तेल का उपयोग और स्निग्ध आहार ।

2. गर्म तासीर और तापमान काकQ आहार एवं गर्म गुनगुने तापमान का जल।

3. गुनगुने तापमान के तेल की मालिश ।

4. ध्यान रखें कि ठंडी तासीर और तापमान के और रूखे आहार के सेवन से बचें ।  

5. हरिश्रंगार (पारिजात अथवा सिहरुआ) के पत्तियों के सेवन से भी वात को नियंत्रित किया जा सकता है, इसका लिंक नीचे दिया गया है:

कृपया इस लिंक को क्लिककरें ।


वात को संतुलित करने के आयुर्वेदिक 

उपाय : 

वात दोष को संतुलित करने के लिये निम्नलिखित उपाय अपनाये जा सकते हैं:  

1. मीठे, खट्टे तथा नमकीन रस (स्वाद) वाली खाद्य सामग्री का सेवन करने की अनुशंसा है ।

2.तीखे (मिर्च, अदरक, अधिक मसालेदार आहार इत्यादि), कसैले (आँवला, कच्चा अमरूद, पालक, मसूर आदि) तथा कड़वे (करेला और नीम आदि) रस (स्वाद) की खाद्य सामग्री के सेवन  नहीं करने की अनुशंसा है।  

3.रूखे और ठंडी तासीर के आहार का सेवन नहीं करें इससे वात बढ़ता है। स्निग्ध (जिसमें तेल हो) और गर्म तासीर का आहार वात को कम करता है । 


वात और जठराग्नि की स्थिति तथा आहार : 

वर्षा ऋतु में जठराग्नि मंद होती है अतः गरिष्ठ भोजन, रसोई के बाहर का भोजन, बासी अथवा लम्बे समय से रखा हुआ भोजन, ठंडा अथवा फ्रिज में रखा  भोजन, खमीर युक्त भोजन एवं मशरूम, का सेवन नहीं करें ।


वात और अनाज :

वात की प्रकृति रूखी होती है अतः रूखी आहारीय सामग्री जैसे लघु धान्य एवं मोटा अनाज, (मक्का, बाजरा, ज्वार, कोदो और कुटकी आदि) का सेवन नहीं करें । वर्षा ऋतु में नये चावल का सेवन भी नहीं करना चाहिये। 


 वात और दालें : 

चूँकि वर्षा ऋतु में वात को बढ़ाने वाली अथवा गरिष्ठ अथवा भारी दालें जैसे मसूर, उड़द, राजमा, मटर, तिवड़ा, सोयाबीन, चना और छोला आदि, का सेवन नहीं करें । मुँहफली का सेवन भी अधिक मात्रा में नहीं करें ।


वात और सब्ज़ियाँ : 

चूँकि हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ (साग आदि) पाचन में गरिष्ठ जोती हैं अतः वात की स्थिति में इनके सेवन से बचें । गोभियाँ (पत्ता गोभी, फूल गोभी आदि ), बैंगन और मूली भी वात कारक हैं अतः इस मौसम में इनके सेवन से भी बचें ।


वात सन्तुलन एवं पेय जल : 

दूषित जल पाचन तन्त्र को खराब कर सकता है जिससे वायु असन्तुलित हो सकती है। अतः पाचन तन्त्र को ठीक रखने के लिये स्वच्छ जल का सेवन करें ।


वात संतुलित रखने के लिये की बरती जाने वाली सावधानियाँ : 

1.सुपाच्य, हल्के, घर की रसोई में बने भोजन का ही सेवन करें । 

2.रात को भोजन सूर्यास्त से पहले करें । 

3.यदि लघु धान्य और मोटे अनाज का सेवन करें तो गाय के दूध से बना घी लगा कर करें । ऐसा करने से लघु धान्य एवं मोटे अनाज में स्निग्धता बढ़ेगी, जिससे वात के  प्रभाव में वृद्धि नहीं होगी साथ ही पित्त भी संतुलित रहेगा ।

4.गेहूँ चूँकि स्निग्ध होता है इसलिये इस माह में गेहूँ का सेवन किया जा सकता है।

5.इस माह में चावल कम से कम एक वर्ष पुराना ही खायें । चावल यदि नया खायें तो पहले भून लें, फिर  खुले बर्तन में पकायें फिर सेवन करें । चावल  का सेवन दिन में ही करें । 

6.दालों में मूँग दाल (बिना छिल्के की दाल अथवा छिल्के सहित दाल) अथवा अरहर की पतली दाल का गाय के दूध से बने घी से छौंका (बघार कर) लगा कर सेवन करें । 

7.अरहर की भुनी दाल खुले बर्तन में पकाकर तथा फेन को हटा कर बनायें और घी का छौंका लगा कर सेवन करें। 

8.गाय के दूध से बने घी से छौंका लगा कर, मूँग की दाल और पुराने अथवा भुने चावल से बनी खिचड़ी का भी सेवन कर सकते हैं।

9.स्वच्छ जल को स्वच्छ पात्र में तब तक उबालें जब तक जल की मात्रा आधी हो जाये फिर ठंडा कर उपयोग में लें । जल को उबालते समय, जल में आधा चम्मच ज़ीरा अथवा अजवाईन  अथवा दो से तीन लौंग प्रति गंज पानी में डालें और औषधीय गुणों से भरपूर जल तैयार करें और सेवन  करें जो कि पाचन को ठीक करने के लिये तथा वात को नियंत्रित करने के लिये लाभकारी होता है । 

10.खाना और पानी को ढक कर सुरक्षित स्थान पर रखें ।

11.यदि वर्षा ऋतु में साग का सेवन करना है तो, पहले साग को उबालें फिर हाथ के बीच दबा कर रस निकाल कर अलग कर दें । अब साग को गाय के दूध से बने घी में भून कर सब्ज़ी बना कर सेवन कर सकते हैं ।


 वात को कम करने के लिये विहार:

1.शरीर में जहाँ भी दर्द हो उस स्थान में पर गुनगुने तेल की हल्की मालिश भी लाभकारी होती है। वात की उत्तम प्राकृतिक औषधीय तेल है।

2.अनुशंसित रूप से रोज़ ध्यान करें, प्रसन्न रहें, स्वयं  को चिंतामुक्त  रखें ।

3.मन में किसी भी प्रकार के तनाव नहीं आने दें । 

4.बहुत तेज़ दौड़ना, भागना, कसरत करना, भावनात्मक वेग में नहीं बहना है ।

5.तेज़ आवाज़ में बजता हुआ संगीत अथवा तेज़ थाप और धुन का संगीत नहीं सुनना है।


शरीर की गैस से मुक्त होने के लिये :

आहार लेने के पश्चात्, आहार के पाचन के फलस्वरूप वायु का निर्माण होता है जिससे मुक्त होना आवश्यक होता है ज्जिसके लिये निम्नलिखित प्रयास लाभदायक हो सकते हैं:

1. सुबह पवन मुक्तासन करें ।

2. खाना खाने के बाद 100 कदम टहलें ।

3. खाना खाने के बाद वज्रासन करें ।

4. सोने के पहले बायें करवट ले कर कुछ  
    देर  लेटें।

आग्रह:
कृपया उपरोक्त लेख के बारे में अपने अमूल्य सुझाव, विचार और  प्रश्न, दिये गये कमेंट बॉक्स में अभिव्यक्त करें

अधिक जानकारी के लिये सम्पर्क करें- डॉ.सी.जे.सिंह
खाद्य वैज्ञानिक
वॉट्स ऐप क्रमांक: 9893064376

सादर


Thank You for writing. Please keep in touch. 
Avtar Meher Baba Ki Jai Jai Jinendra Always 

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Dr. Kinjulck C. Singh
Dr. Chandrajiit Singh
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